रामपुर में 31 दिसंबर की रात जब पूरा शहर नए साल के जश्न में डूबा था तभी अचानक आधी रात में गोलियों की तड़तड़ाहट से सीआरपीएफ ग्रुप केंद्र गूंज उठा था। 16 साल पहले सीआरपीएफ ग्रुप केंद्र पर हुए आतंकी हमले में सीआरपीएफ के सात जवानों की मौत हो गई थी। वहीं एक रिक्शा चालक की भी जान चली गई थी। जनपदवासियों के जेहन में आज भी उस हमले की यादें हैं।
दो नवंबर 2019 को चार आतंकियों को फांसी की सजा सुनाई, जिनमें पाकिस्तानी इमरान शहजाद, मोहम्मद फारुख, बिहार के मधुबनी निवासी सबाउद्दीन और रामपुर के बदनपुरी के शरीफ उर्फ सुहैल शामिल थे।
वहीं मुरादाबाद में मूंढापांडे के जंग बहादुर को आजीवन कारावास और मुंबई के गोरेगांव निवासी फहीम अंसारी को दस साल की सजा हुई थी। कोर्ट ने इस मामले में प्रतापगढ़ निवासी मोहम्मद कौसर और बरेली के बहेड़ी निवासी गुलाब खां को बरी कर दिया था।
हवलदार ऋषिकेश राय, हवलदार रामजी शरण मिश्रा, हवलदार अफजल अहमद, सिपाही मनवीर सिंह, सिपाही विकास कुमार, सिपाही देवेंद्र कुमार और सिपाही आनंद कुमार। खंडिया निवासी रिक्शा चालक किशन लाल की भी हमले में मौत हुई थी।
सीआरपीएफ ग्रुप केंद्र पर हुए आतंकी हमले के मुकदमे को वापस लेने की कोशिश भी हुई थी। सपा सरकार में गृह विभाग की ओर से डीएम-एसपी को पत्र भेजकर यह पूछा गया था कि क्या इस मुकदमे को वापस लिया जा सकता है।
इसके बाद मामले का इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया था और कड़ी टिप्पणी की थी। हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद प्रदेश सरकार बैकफुट पर आ गई थी और मुकदमे को वापस लेने का मामला ठंडे बस्ते में चला गया था।