उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ तहसील क्षेत्र के गांव मनगढ़ में रामकृपाल ने जब जन्म लिया तो शायद किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर वह कृपालु महाराज बनकर पूरे विश्व में चमकेंगे।
रामकृपाल से कृपालु जी महराज बने जगद्गुरु बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। वह किसी जगद्गुरु के उत्तराधिकारी नहीं हैं बल्कि अपनी प्रतिभा के बूते उन्होंने मूल रूप से यह उपाधि हासिल की है।
उपाधि उन्हें काशी विद्वत परिषद ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को परखने के बाद 14 जनवरी 1957 को प्रदान की। उस समय वहां पांच सौ से अधिक प्रकांड विद्वान उपस्थित थे और इनकी अवस्था मात्र 34 वर्ष की थी।
मनगढ़ गांव में लालता प्रसाद त्रिपाठी के घर शरद पूर्णिमा की रात्रि वर्ष 1922 में उनका जन्म हुआ। ब्राह्मणों ने उनका नाम राम कृपाल रखा। प्राथमिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई।
शिक्षा ग्रहण करने के दौरान सवालों को लेकर हमेशा शिक्षकों से भिड़ने वाले राम कृपाल खेलकूद में भी बहुत रुचि रखते थे। 16 साल की अल्पायु में ही उन्होंने चित्रकूट के शंभारंभ आश्रम के समीप बीहड़ जंगल एवं वृंदावन में वंशीवट के निकट वास किया।
जहां से वह कृपालु जी के नाम से पहचाने जाने लगे। काशी विद्वत परिषद (काशी के विद्वानों की प्रमुख संस्था) की ओर से भारत के यह पांचवें व्यक्ति थे, जिन्हें जगद्गुरु ही नहीं बल्कि जगदगुरुत्तम की पदवी प्रदान की गई।
लगभग ढाई साल पहले संस्था ने शंकराचार्य, आठवीं या नवीं शताब्दी में निंबार्काचार्य, बारहवीं शताब्दी में रामानुजाचार्य और चौदहवीं शताब्दी में माधवाचार्य को यह उपाधि प्रदान की थी। उनका मत था कि यद्यपि ईश्वर प्राप्ति के मार्ग अनेक हैं लेकिन भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ व सुलभ मार्ग है।
आध्यात्म पर दिए गए इनके प्रवचन को सुनने के बाद काशी विद्वत परिषद के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजनारायण शुक्ल ने घोषणा की थी काशी के विद्वान किसी को आसानी से विद्वान स्वीकार नहीं करते लेकिन भगवत प्रतिभा और दिव्य वांग्मय ज्ञान से इस विद्वान के सामने हम सभी नतमस्तक हैं।
दो दिनों तक जनता के दर्शनार्थ रखा जाएगा पार्थिव शरीर
कुंडा। जगद्गुरु कृपालुजी महराज का अंतिम संस्कार मनगढ़ भक्तिधाम में ही 18 नवंबर को सुबह 11 बजे होगा। उनके अंतिम दर्शन के लिए आने वाली भारी भीड़ को देखते हुए दो दिनों तक सत्संग हाल में ही शव दर्शनार्थ रखने की व्यवस्था की गई है। अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।
भक्तिधाम मनगढ़ में सोमवार सुबह करीब 11 बजे जगद्गुरु कृपालुजी महराज टहलते समय गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। शुक्रवार सुबह 92 वर्ष की आयु में उन्होंने महाप्रयाण लिया। परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार भक्तिधाम मनगढ़ में ही करने का निर्णय लिया है। महराजजी के लाखों अनुयायी होने से परिजनों ने शव दो दिन तक उनके अंतिम दर्शन के लिए विशाल सत्संग हाल में ही रखने की व्यवस्था की है।