कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे को दुरुस्त करने में लगीं प्रियंका वाड्रा की सक्रियता से यह बात तय हो गई है कि आगामी लोकसभा चुनाव में एक बार फिर इन संसदीय क्षेत्रों की कमान उन्हीं के हाथों में होगी।
यही वजह है कि चुनाव से पहले वे इन क्षेत्रों में पार्टी संगठन के कील-कांटे दुरुस्त कर लेना चाहती हैं। कांग्रेस की सियासी सेना के गठन में उनकी अंतिम मुहर का भी यही मतलब निकाला जा रहा है।
मकसद ये कि मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्रों से बेफिक्र होकर पूरे देश में पार्टी का चुनाव प्रचार कर सकें।
2009 लोकसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी का चुनाव संचालन कर चुकीं प्रियंका वाड्रा ने एक फिर इन दोनों संसदीय क्षेत्रों की कमान अपने हाथों में लेने के संकेत दिए हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने अचानक ही इन क्षेत्रों का काम संभाला था, जबकि इस बार वे काफी पहले से इस कवायद में लग गई हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के हालात भी दोनों संसदीय क्षेत्रों में पहले से अलग हैं।
तब रायबरेली और अमेठी की दस विधानसभा सीटों में छह पर कांग्रेस काबिज थी, जबकि आज यह आंकड़ा महज दो है। पिछले चुनाव में दोनों संसदीय सीटों पर सपा ने प्रत्याशी नहीं उतारा था।
इस बार अभी तक असमंजस है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री और प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री इटावा और मैनपुरी में पार्टी प्रत्याशी उतारने की वकालत कर चुके हैं तो जवाब में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने रायबरेली-अमेठी से प्रत्याशी उतारने के मामले को संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारी बताकर पत्ते नहीं खोले हैं।
हालांकि रायबरेली और अमेठी में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं का रुख बिल्कुल अलग होता है। बावजूद इसके कांग्रेस कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है।
गांधी फैमिली भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि इन क्षेत्रों में सोनिया गांधी अथवा राहुल गांधी को मत कम मिले तो संदेश दूर तक जाएगा। उधर, यह चुनाव राहुल गांधी के लिए काफी अहम माना जा रहा है।
बदली परिस्थितियों में पार्टी पहले से ही इन क्षेत्रों में अपने कील-कांटे दुरुस्त कर लेना चाहती है। प्रियंका की कवायद इसी की तैयारी है। प्रियंका पार्टी पदाधिकारियों का चयन काफी ठोंक बजाकर कर रही हैं।