10 साल पहले रोजी की तलाश में प्रेम बाबू ने उत्तर प्रदेश में अलीगंज स्थित घर छोड़ा और सरहद तक पहुंच गया। सरहद के नजदीक पहुंचने की चाह ने उसे पाकिस्तान में कैद करा दिया।
पाक सेना ने पहले आतंकवादी बताया और उसके बाद कोकीन का तस्कर बनाकर जेल में डाल दिया। प्रेमबाबू की कहानी भी कुछ सरबजीत जैसी ही है फर्क है तो बस यही कि वह जिंदा वहां से लौट आया। पाक जेल से रिहा होकर आने के बाद सरकार ने उसका इलाज कराया।
सेहत कुछ सुधरी तो गांव और घर की याद आई। उसे मरा हुआ माने बैठे परिवारीजन और ग्रामीण उसका फिर से पुनर्जन्म इसे मान रहे है।
अलीगंज के गांव अगौनापुर निवासी प्रेमबाबू मिश्रा (64) 10 वर्ष पहले बिना किसी को बताए नौकरी करने बुलंदशहर चले गए थे।
वह बताते है कि यहां उनकी मुलाकात ठकुराल ट्रांसपोर्ट के मालिक गुरूमीत सिंह से हुई और वह उनके साथ नौकरी करने अमृतसर चले गए।
वह चाय पीने के लिए एक दुकान पर जाते थे। यहां उनकी दोस्ती भेड़ चराने वालों से हो गई। फरवरी वर्ष 2004 में भेड़ चराने वालों के साथ वह पाकिस्तान बार्डर तक चले गए और तभी पाकिस्तानी सेना ने दो लोगों के साथ उन्हें पकड़ लिया।
पहले पाक सेना ने उन्हें आतंकवादी बताकर जिला सियाल की कोर्ट में पेश किया लेकिन न्यायाधीश ने उन्हें आतंकवादी नहीं माना। इसके बाद सेना उनके पास कोकीन बरामद दिखा दी।
हर 15 दिन बाद पुलिस उन्हें कोर्ट ले जाती और हर बार पूछा जाता था कि तुम्हारा कोई जमानत लेने वाला हो तो बताओ और वह फिर जेल लौट आते।
दिसंबर वर्ष 2012 में भारत-पाकिस्तान के बीच जेल में बंद एक दूसरे के देश के कैदियों को छोड़ने पर सहमति बनी, उसके बाद उनकी भी रिहाई हुई। भारत आने के बाद सरकार ने बीमार कैदियों का इलाज दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में कराया।
स्वस्थ होने के बाद पहले वह अपने परिवारीजनों से मिले और फिर गांव पहुंचे। प्रेमबाबू का इकलौता पुत्र मनोज कुमार है जो ग्रेटर नोएडा में नौकरी करता है तथा पत्नी की मृत्यु वर्ष 1989 में हो चुकी है। 85 साल की वृद्ध मां है जो अब देख व सुन नहीं सकती है। तीन भाईयों तथा मां प्रेमबाबू को जीवित देखकर फूले नहीं समा रहे हैं।
पाक जेल में मिलती थी एक रोटी सुबह-शाम
पाक की सियाल जेल में भारतीय कैदी प्रेमबाबू को न भरपेट खाना मिलता और न दूसरी सुविधाएं। सप्ताह ने स्नान के लिए भी एक दिन नियत था। वहां के हालात का जिक्र करते हुए प्रेमबाबू की आंखे नम हो जाती है। प्रेमबाबू ने बताया कि खाने में एक रोटी सुबह तथा एक रोटी शाम को दी जाती थी।
भूख लगने पर जब खाना मांगा जाता था तो चावल दे दिए जाते। जेल में उन्हें पूजा-अर्चना नहीं करने दी जाती थी। जेल में उन्हें यातनाएं तो नहीं दी गईं, लेकिन भरपेट भोजन न मिलने के कारण बीमारी ने घेर लिया। कमजोरी के चलते रोज बेहोश होकर गिर पड़ते थे।
इलाज भी ठीक से नहीं करवाया जाता था। जेल में प्रेमबाबू को एक सप्ताह में एक दिन नहाने को मिलता था। दूसरे कैदी कहते थे की पंडित तो नहीं है जो रोज-रोज नहाने की बात करता है। नहाने के लिए एक छोटा साबुन दिया जाता था, जो नहाने के बाद वापस ले लिया जाता था।
वह बताते है कि भारत की तरह पाकिस्तान का कानून अलग है। भारत में जेल में बंद कैदियों की पैरवी के लिए सरकार सरकारी वकील दिलाती है, लेकिन पाकिस्तान के कानून में ऐसा कुछ नहीं है।
वोटर लिस्ट से कट गया था प्रेमबाबू का नाम
अगौनापुर निवासी प्रेमबाबू को मरा समझकर गांववालों ने उसका वोटर लिस्ट से नाम भी कटवा दिया। अब वह अपने को जिंदा साबित करने के सबूत देते हुए वोटर लिस्ट में नाम शामिल कराने के लिए प्रयास कर रहा है।
गांव निवासी मेघ सिंह शाक्य, वासुदेव सिंह शाक्य, दयाराम, ठाकुर सिंह, अरूण कुमार, वीरपाल, बदन सिंह आदि ने बताया कि प्रेमबाबू गांव आए तो लोग उन्हें देखकर चकित रह गए।
कई लोग यह कहने लगे कि यह प्रेमबाबू नहीं हैं जब उन्होंने अपनी आप बीती सुनाई तब लोगों को यकीन हुआ। सबसे अधिक प्रसन्न उनकी बूढ़ी मां तथा बेटा है। गांव में उनकी खेती है अब लोग उनसे शाम को चौपाल पर पाकिस्तान जेल के किस्से सुनते हैं।