वर्ष 2015 में भंडारा होने के कारण ताजियादारों ने ताजिया उठाने से इनकार कर दिया। जिले के साथ ही पूरे प्रदेश में ताजिया नहीं उठने पर शासन तक खलबली मच गई। शासन के निर्देश के बाद दूसरे दिन डीएम-एसपी ने किसी तरह ताजिया दफन कराया।
इसके बाद शुरू हुई प्रशासन की लिखापढ़ी 2016 तक चलती रही। 2016 में हालत यह हो गई कि झंडों की गिनती हुई तो वहां लगने वाली चांदनी की माप भी कराई गई। इसके बाद भंडारे पर रोक लगा दी गई। इसके खिलाफ उदय प्रताप सिंह कोर्ट चले गए।
कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट को अपने विवेक से निर्णय लेने का आदेश दिया। इसके बाद से यहां भंडारा बंद हो गया। बावजूद इसके मोहर्रम पर लगने वाली चांदनी, गेट और झंडे को लेकर विवाद जारी रहा। झंडे का विवाद 2019 में सुलझा। अब शेखपुर में सड़क पर बने गेट को लेकर बवाल शुरू हो गया है।
प्रशासन का तर्क है कि गेट पहले भी बनता रहा है। उधर, उदय प्रताप सिंह का कहना है कि यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। इसके नीचे से हम अपने झंडे लेकर कैसे गुजरेंगे। इसके साथ ही सबंधित जगह पीडब्ल्यूडी विभाग के दायरे में हैं। नियमानुसार कोई सड़क पर गेट नहीं बना सकता।