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चालीस साल की ‘काजी सियासत’ पर ग्रहण!

Wed, 02 Oct 2013 10:21 AM IST
शशांक मिश्र/सहारनपुर
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 40 साल से मुस्लिम राजनीति में एकतरफा दखल रखने वाले काजी रशीद मसूद की सियासत पर ग्रहण लग सकता है।
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जेल जाने वाले पहले राज्यसभा सदस्य के बेटे शादान मसूद को विरासत सौंपने का सपना भी अधूरा रह गया।

राजनीतिक और पारिवारिक जीवन के चुनौतीपूर्ण दौर में काजी को अब राज्यसभा की सदस्यता के साथ ही एपिडा चेयरमैन पद से भी इस्तीफा देना होगा। कांग्रेस भी उनसे दूरी बना सकती है।

मुस्लिम राजनीति में तगड़ी पैठ रखने वाले काजी रशीद मसूद के राजनीतिक भविष्य पर गहरा संकट मंडरा रहा है। पारिवारिक विद्रोह के बाद बेटे को राजनीतिक विरासत सौंपने में जुटे काजी मुसीबतों में ऐसे फंसे कि उसमें उलझ कर ही रह गए।
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दरअसल, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वर्ष 2011 में शाही इमाम के दामाद उमर अली खां को बेहट विधानसभा से प्रत्याशी बनाए जाने से नाराज काजी ने सपा का साथ छोड़ दिया था।

मुस्लिम वोट बैंक को कांग्रेस के पाले में ले जाने के दावे के साथ उन्होंने उधर का ही रुख कर लिया। कांग्रेस में काजी को बड़ी तवज्जो दी गई।

इससे पहले कांग्रेस के साथ काजी ने गंगोह विधानसभा सीट से एक विधायक को जीत दिलाकर अपनी ताकत का अहसास भी कराया था, हालांकि नकुड़ विधानसभा सीट से भतीजे इमरान को हार का मुंह देखना पड़ा था। इसी के बाद इनके परिवार में विद्रोह शुरू हो गया।

बेटे शादान को ज्यादा तरजीह दिए जाने से नाराज भतीजे पूर्व विधायक इमरान मसूद ने चाचा के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। काजी हर हाल में बेटे शाजान को लोकसभा चुनाव में सहारनपुर सीट से प्रत्याशी बनाने में जुटे थे।

मगर, पारिवारिक विद्रोह और 22 साल पुराने एमबीबीएस सीट घोटाले ने काजी की सियासत पर ही ब्रेक लगा दिया। इस बीच सपा ने काजी की राजनीतिक विरासत पर कब्जा करने के लिए भतीजे इमरान को एंट्री देकर लोकसभा का प्रत्याशी भी घोषित कर दिया।

अब जब कि काजी को न्यायालय ने सजा सुना दी है और उन्हें जेल जाना पड़ा, तो ऐसे में बेटे की सियासत पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कारण, अगर सहारनपुर सीट से कांग्रेस के टिकट पर बेटे को उतारते हैं, तो उन्हें भतीजे इमरान का सीधा मुकाबला करना पड़ेगा।

ऐसे में चुनाव परिणाम अगर काजी के पक्ष में नहीं आएगा तो उनकी सियासत पर उंगली भी उठ सकती है।

भतीजे की राह भी करेंगे मुश्किल
दरअसल, काजी रशीद मसूद खुद इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि राजनीतिक और पारिवारिक जीवन में चुनौती उनके भतीजों की वजह से है।

एमबीबीएस सीट घोटाले में उनके भतीजे डॉ. अदनान मसूद और राजनीतिक जीवन में मुश्किल खड़ी करने में पूर्व विधायक इमरान मसूद की भूमिका रही है।

न्यायालय से दोषी करार दिए जाने के बाद काजी के निजी सचिव जगवेश शर्मा ने बयान जारी कर कहा था कि पूर्व विधायक के छोटे भाई डा. अदनान मसूद के अयोग्य होने पर एमबीबीएस में दाखिल दिलाने का संज्ञान लेने के चलते कोर्ट ने दोषी माना है।

बिगड़ी कांग्रेस की चुनावी रणनीति
कांग्रेस वेस्ट यूपी जिस फेस को आगे करके परचम लहराने का ख्वाब संजो रही थी, वह टूट गया है। उनके जैसे कद और अनुभव वाला कोई दूसरे नेता वेस्ट यूपी में कांग्रेस केपास नहीं है। अब कांग्रेस केसामने संकट रहेगा कि किस चेहरे को सामने लाकर चुनाव लड़ा जाए।

उसके पास कोई ऐसा निर्विवाद और कद्दावर मुस्लिम नेता नहीं है जो रशीद मसूद की तरह भाजपा के साथ ही आजम और मुलायम पर सीधे हमले कर सके।

सभी दलों में घूमे, अपनी पार्टी भी बनाई
भारतीय लोकदल से राजनीति की शुरुआत करने वाले मसूद जनता पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, समाजवादी पार्टी और अब कांग्रेस में हैं। वह अपनी पार्टी राष्ट्रीय एकता पार्टी बनाकर भी चुनाव लड़ चुके हैं। सहारनपुर जिले में अपनी मौजूदगी का अहसास भी कराया था।
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मुलायम ने लड़ाया था उप राष्ट्रपति चुनाव
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने रशीद मसूद को वर्ष 2007 में उप राष्ट्रपति का चुनाव लड़ाया था। वह संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में प्रतिभा पाटिल विजयी हुईं  थी। मसूद 75 वोट हासिल कर तीसरे नंबर पर रहे थे।
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