मुजफ्फरनगर के दंगों ने पश्चिमी यूपी की राजनीति के सारे समीकरण ही बदल दिए हैं। सभी दल नए सिरे से अपनी रणनीति बनाने में लगे हैं।
रालोद के मुस्लिम-जाट समीकरण में डिफेक्ट और गांवों तक दिख रहे मोदी इफेक्ट के चलते भाजपा लोकसभा चुनाव में परफेक्ट दिखना चाहती है।
मुजफ्फरनगर दंगे में कई दिन तक रालोद प्रमुख अजित सिंह और अन्य नेताओं के ढीले रवैये को लेकर माना जा रहा है कि जाट रालोद से रूठ गए हैं।
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वहीं शुरू से ही भाजपा नेताओं के कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े रहने के कारण पार्टी की जाटों के बीच बढ़त दिख रही है। साथ ही भाजपा की भाकियू से नजदीकियां भी लगातार बढ़ती चली जा रही हैं।
पश्चिमी यूपी में मुस्लिमों की तरह ही जाट वोट बैंक भी अपनी अलग अहमियत रखता है। जाट-मुस्लिम समीकरण पर रालोद ने कई बार बाजी मारी है लेकिन इस बार कहानी एकदम से बदली दिख रही है।
सपा से नाराज बताए जा रहे मुस्लिमों पर कांग्रेस की नजर लग गई है। इसी तरह रालोद से रूठे जाट भाजपा की ओर रुख कर सकते हैं, जिसके लिए भाजपा भी पूरी तैयारी में है।
दंगों के बाद गांवों तक का माहौल भाजपा की उम्मीदों को हवा दे रहा है। ऊपर से मोदी इफेक्ट अलग से काम कर रहा है। इस मौके को भाजपा गंवाना नहीं चाहती है।
एक और कारण यह भी है कि पिछले चुनाव में भाजपा का रालोद से गठबंधन था। लेकिन इस बार जाट वोट अपने दम पर ही हासिल करने हैं।
भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सतपाल मलिक कहते हैं कि वे यह तो नहीं बता सकते कि भाजपा से कितने जाट प्रत्याशी होंगे, लेकिन इतना जरूर है कि पांच-छह जाट सांसद होते रहे हैं, इसलिए इस बार भी चार-पांच टिकट की संभावना है।
वहीं, रालोद प्रदेश अध्यक्ष मुन्ना सिंह चौहान यह मानने को तैयार नहीं है कि जाट वोटर रालोद से नाराज हैं। मुन्ना का दावा है कि ऐसा संभव ही नहीं है कि जाट हमसे नाराज हो जाएं।
जयंत चौधरी मेरठ भी होकर आ चुके हैं और मुजफ्फरनगर भी, कहीं कोई विरोध नहीं हुआ।