कवाल कांड और नंगला मंदौड़ की पंचायत के बाद मुजफ्फरनगर में भड़के दंगे में पुलिस पर बलवाईयों के खिलाफ कार्रवाई न करने का इस कदर भारी दबाव था कि खुद अपने ऊपर हुए हमलों को भी खाकी पचा गई।
अक्सर मामूली घटनाओं में भी संगीन धाराएं लगा देने के लिए बदनाम पुलिस के हाथ दंगों की सियासी बेड़ियों में ऐसे बंधे कि सिपाही को गोली लगने से लेकर हिंसक भीड़ में घिरे आला अफसरों की जान तक पर बन आने के बावजूद कई बड़े मामलों में पुलिस ने कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया।
बवाल की बेहद अहम कड़ी जौली नहर कांड से आंख फेरने के पीछे भी यह वजह रही। यहां हुए खूनी हमलों के सिलसिले में पुलिस अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं कर पाई है।
हाल में हुए सनसनीखेज खुलासे के बाद उठा बवंडर पुलिस महकमे के लिए ही नहीं, कद्दावर सियासतदां के गले की भी फांस बन चुका है। दंगे के बड़े राज परत-दर-परत खुल रहे हैं और कई अभी खुलने बाकी हैं।
हिंसा प्रभावित इलाकों में कार्रवाई में पक्षपात को लेकर आरोपों से घिरी पुलिस के मुंह से अब तक जो सच बाहर आया है, वह आधा-अधूरा ही है।
कवाल के खूनी मंजर और उसमें उचित कार्रवाई के बजाय पकड़े गए आरोपियों को छोड़ देने के आरोपों से उभरे जनाक्रोश के हर सच से अफसर वाकिफ थे, लेकिन सत्ताधारी के इशारे पर नाचता प्रशासन दूध का दूध-पानी का पानी नहीं कर सका।
पुलिस तो इससे भी आगे बढ़ गई। जौली और पुरबालियान में हुए सुनियोजित हमलों को कुचलने के लिए बड़ी कार्रवाई की जरूरत महसूस नहीं की गई।
अफसर किसी के लापता होने से इंकार करते रहे। जौली नहर में एक-एक कर तीन लाशें मिल गईं। शक मिटाने के लिए नहर को बंद कराने की कोशिश तक नहीं की गई।
दंगे में पुलिस वालों पर भी कई बडे़ हमले हुए, जिन्हें केवल इसलिए पचा लिया गया कि कहीं नेता नाराज न हो जाएं। कार्रवाई के दायरे में कौन-कौन रखा जाए, इसकी पटकथा भी मनमाने ढंग से लिखी गई।
आईजी से लेकर डीजीपी तक यहां आए, लेकिन कोई भी बदली फिजा को नहीं भांप पाया। नतीजा सबके सामने है। वर्दी की जुबानी हवा में तैर रहे आरोपों की पुष्टि हुई, तो सरकार के विरुद्ध पनपे जनाक्रोश का पारा और चढ़ गया है।