पीलीभीत। गौहनियां चौराहे से नौगवां चौराहे तक शहर में नेशनल हाईवे पर 2.1 किलोमीटर हिस्से में सैकड़ों गड्ढे हैं। ई-रिक्शा पर बैठकर गड्ढों का जायजा लेने निकले डॉक्टर चेतांशु दीक्षित ने गड्ढे गिने। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ममता सक्सेना व कई अन्य चिकित्सक भी सड़कों का हाल जानने निकले। सभी ने एक ही बात कही। मरीजों की पीड़ा को और बढ़ा देते होंगे ये गड्ढे।
शाहजहांपुर से पीलीभीत होते हुए खटीमा जाने वाले मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग का दर्जा है। राजमार्ग 371 के शाहजहांपुर से बीसलपुर, बरखेड़ा, पीलीभीत, न्यूरिया, मझोला होते हुए खटीमा में नेशनल हाईवे संख्या नौ में जुड़ता है। पीलीभीत जनपद में इसकी सीमा 27 किलोमीटर आती है। इसमें यह 2.1 किलोमीटर हिस्सा शहर के भीतर है, जो नौगवां से शुरू होकर गौहनियां चौराहे तक जाता है। इसमें कुछ गड्ढे भरे गए हैं। कुछ स्थानों पर गड्ढे भरने के नाम पर सिर्फ रस्म अदायगी हुई है। अधिकारी हाईवे को पूरी तरह से गड्ढा मुक्त नहीं करा सके हैं। शहर में हाईवे पर गड्ढों हाल देखने के लिए अमर उजाला की पहल पर सेवानिवृत्त क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. लक्ष्मीकांत दीक्षित, बीएएमएस चिकित्सक डा. अनिल सक्सेना, डॉ. अनुरिता सक्सेना, हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. पीएन सक्सेना ई-रिक्शा पर सफर किया। डॉक्टरों का कहना है कि गड्ढों की वजह से हादसे होते हैं। पीड़ित से बातचीत में पता चलता है कि सड़क पर अचानक गड्ढा आने से बाइक फिसल गई, जिसकी वजह से फ्रैक्चर हो गया।
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सरकार को ध्यान देना चाहिए
गड्ढों की वजह से ऐसी गर्भवती भी इमरजेंसी में आईं हैं जिनके बच्चे की आधी डिलीवरी वाहन में ही हो गई। ऐसे में अगर जच्चा- बच्चा को तत्काल उपचार नहीं मिलता है तो दोनों की जान जा सकती थी। मेरा सरकार से यही कहना है कि सड़कें गड्ढा मुक्त की जाएं, जिससे मरीजों की जान बचे और आम आदमी भी हादसे का शिकार न हो।
-डॉ. ममता सक्सेना, स्त्री रोग विशेषज्ञ
गड्ढों की वजह से होती हैं दुर्घटनाएं
इतने गहरे गड्ढे हैं कि कभी-कभी ई-रिक्शा पलट जाता है। बाइक फिसल जाती है। फ्रैक्चर होने की वजह से ट्रॉमा केस बहुत आते हैं। एक महीने में 18-20 हादसे इन गड्ढों की वजह होते हैं। लोगों को स्पाइन फ्रैक्चर तक गड्ढों से हुए हैं। बैकपेन होना तो बड़ी छोटी बात है। मैं सरकार से रहमोकरम की अपेक्षा रखता हूं। - डॉ. पीएन सक्सेना, हड्डी रोग विशेषज्ञ
इतने गड्ढे कि गिनना छोड़ दिया
मरीजों के लिए यह गड्ढे बेहद खतरनाक हैं। आम आदमी भी परेशानी उठा रहा है। मैं तो पहले गड्ढे गिन रहा था लेकिन जब हाईवे के 2.1 किलोमीटर हिस्से की शुरूआत में यह संख्या सैकड़ों में आ गई तो मैंने गिनती छोड़ दी। अब मेरा सवाल यही है कि जिम्मेदारों को यह गड्ढे दिखते क्यों नहीं हैं? सड़कें कब गड्ढ मुक्त होंगी यह भी बताया जाए? - डॉ. चेतांशु दीक्षित, एमबीबीएस
इंसान और वाहन दोनों का नुकसान
मैंने ई-रिक्शा से सफर करते हुए मरीजों की तकलीफ को समझा है। सड़क पर गड्ढे होने से सिर्फ मरीज नहीं वाहन भी बीमार हो रहे हैं। वाहनों की एलाइनमेंट खराब हो जाती है। टायर का खर्च भी बढ़ रहा है। कार सवार को जो तकलीफ होती है वह अलग । इसलिए इन गड्ढों को भरा जाना बहुत जरूरी है। - डॉ. लक्ष्मीकांत दीक्षित, सेवा निवृत्त चिकित्साधिकारी
महिलाओं को बहुत पीड़ा होती होगी
मैंने अपने पति के साथ ई-रिक्शा पर थोड़ा सा सफर किया तो मुझे बैक पेन होने लगा। मैं समझ सकती हूं कि मरीज और महिलाओं को किस तरह की तकलीफ होती है। गांव से अधिकतर मरीज ई-रिक्शा से ही आते हैं। ऐसी महिलाओं को बहुत खतरा रहता है। रास्ते में वाहन में भी प्रसव हुए हैं। - डॉ. अनुरिता सक्सेना, वरिष्ठ चिकित्सक
जिनकी जिम्मेदारी सड़कों को गड्ढा मुक्त करने की है उन्हें सड़कों के इतने गहरे-गहरे गड्ढे नजर क्यों नहीं आ रहे हैं? मेरा सवाल यह है।
- डॉ. अनिल सक्सेना, वरिष्ठ चिकित्सक
बरेली-टनकपुर हाइवे पर अशोक कॉलोनी के निकट सड़क में हुआ गड्ढा। संवाद- फोटो : PILIBHIT