पीलीभीत। उपेक्षा का शिकार हुए रतनदीप सिंह ने ताइक्वांडो में महारथ हासिल किया था। सातवीं नार्थ इंडिया ताइक्वांडो प्रतियोगिता में 1997 में पहली बार प्रतिनिधित्व किया था। इसमें वे गोल्ड मेडल हासिल किए थे। इससे जनपद के वह पहले स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी बन गए थे। इसके बाद 2002 में एक्सीडेंट में गंभीर चोट लगने से उन्हें खेल से संन्यास लेना पड़ा। कंधों में गहरी चोट लगने से ताइक्वांडो एक सपना बनकर रह गया, मगर इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। स्वास्थ्य होने के बाद गांधी स्टेडियम में ताइक्वांडो के खिलाड़ियों से अपने अनुभव साझा करने के साथ ही बेहतर प्रदर्शन को लेकर जानकारी देने लगे। अब तक करीब 80 से अधिक खिलाड़ियों को लेकर तैयार कर चुके हैं। इनमें करीब आठ खिलाड़ी नेशनल स्तर पर प्रतिभाग कर चुके हैं।
शहर के मोहल्ला इनायतगंज निवासी रतनदीप सिंह व्यवसाय कहते हैं कि मौजूदा समय में रेलवे बोर्ड के मेंबर भी है। वे बताते हैं कि 1992 में पहली बार दोस्त सुमित के साथ गांधी स्टेडियम में गए थे। वहां हॉकी कोच सुरेश कौशल खिलाड़ियों को प्रैक्टिस करा रहे थे। हम भी हॉकी खेलना चाहते थे। मगर बिना किट के कोच ने हॉकी टीम में प्रैक्टिस कराने से मना कर दिया। इससे वह मायूस होकर दूसरी ओर चले गए। वहां ताइक्वांडो के कोच राजेंद्र गुप्ता खिलाड़ियों को प्रैक्टिस करा रहे थे। उनसे प्रैक्टिस में शामिल करने की बात कहीं। इस पर वह राजी हो गए। हॉकी कोच की उपेक्षा अंदर तक बैठ गई। इससे उसी समय कुछ बनने की ठान ली। इसके बाद लगातार खेलते गए। जिला, मंडल, स्टेट से लेकर नेशनल स्तर तक खेले। कई बार कांस्य मेडल जीते। मगर असली खुशी 1997 में पहली बार मिली। जब देहरादून में हुई स्टेट चैंपियनशिप प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल मिला। इससे खेल के प्रति और लगाव बढ़ा गया। उस समय गोल्ड मेडल जीतने पर जिला प्रशासन की ओर से तीन हजार का पुरस्कार भी दिया गया था। इसी दौरान 2002 में दिल्ली में तृतीय ऑल इंडिया आमंत्रण ताइक्वांडो प्रतियोगिता हुई थी। प्रदेश की ओर से प्रतिनिधित्व किया और गोल्ड मेडल जीता था। प्रतियोगिता के बाद घर आए थे। कुछ दिन बाद निजी काम से गजरौला के लिए जा रहे थे। इसी दौरान एक्सीडेंट हो गया। काफी गंभीर चोटें आईं। सबसे ज्यादा चोट कंधों पर आई थी। इससे कंधे कमजोर हो गए और ताइक्वांडो से संन्यास लेना पड़ा। मगर इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और अपने जैसे और खिलाड़ियों को बनाने में जुट गए। स्वास्थ्य होने के बाद गांधी स्टेडियम जाना शुरू कर दिया था। वहां ताइक्वांडो के कोच की जगह खाली हो गई थी। इससे वहां ताइक्वांडो के खिलाड़ियों से अनुभव साझा करने के साथ ही बेहतर प्रदर्शन के तरीकों को मौखिक रूप से प्रशिक्षण देने लगे। 2002 से प्रेरक और मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे।
2002 तक की यह रहीं उपलब्धियां
- 1996 में 6वीं ऑल इंडिया आमंत्रण ताइक्वांडो प्रतियोगिता में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए कांस्य पदक
- 1997 में 7वीं नार्थ इंडिया आमंत्रण ताइक्वांडो प्रतियोगिता में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक
- 1998 में 18वीं सीनियर राष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया और कांस्य पदक जीता
- 1999 में 19वीं सीनियर राष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक
- 2001 में 31वीं राष्ट्रीय ओलंपिक खेल पंजाब में हुई प्रतियोगिता में कांस्य पदक
- 2002 में तृतीय ऑल इंडिया आमंत्रण ताइक्वांडो प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक
- 2002 में 32वें राष्ट्रीय ओलंपिक आंध्र प्रदेश में हुई प्रतियोगिता में प्रदेश का प्रतिनिधित्व
- 2002 में 14वीं एशियाड खेल बुसान के लिए इंडिया कैंप में चयनित हुए
इन खिलाड़ियों के लिए बने मार्गदर्शक
सड़क दुर्घटना में गंभीर चोट आने के बाद ताइक्वांडो से संन्यास लेने के बाद वैसे तो कई बच्चों को उन्होंने बेहतर प्रदर्शन के खुद के अनुभव साझा किए। मगर इनमें मनीष मिश्रा, ह्देयांश मिश्रा, माही राजपूत, जितिन सक्सेना, साहिल सक्सेना, वेदांत उपाध्याय ने रतनदीप सिंह के अनुभव के अनुसार प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया था। यह सभी खिलाड़ी नेशनल स्तर पर परचम लहरा चुके हैं। इसके अलावा कई अन्य खिलाड़ी भी मंडल और स्टेट स्तर की प्रतियोगिता में प्रतिभाग कर चुके है।
रतनदीप सिंह एक अच्छे ताइक्वांडो खिलाड़ी रहे। उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में जनपद का नाम रोशन किया था। हादसे के बाद खेलने की स्थिति में नहीं है। मगर कई साल से स्टेडियम में बच्चों को ताइक्वांडो के प्रति खिलाड़ियों से अपने अनुभव साझा करते आ रहे हैं। - राजकुमार, जिला क्रीड़ा अधिकारी