फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जंगल में दखलअंदाजी न करें लोग, टाइगर रहेंगे सुरक्षित और संरक्षित

विज्ञापन
विज्ञापन
पीलीभीत। पर्यावरण विद और लेक्चरर टीएच खान ने अपने सहयोगियों, ग्रामीणों तथा वनकर्मियों की मदद से टाइगर रिजर्व क्षेत्र व उसके आसपास के गांवों में टाइगर के बदलते स्वभाव को समझने के लिए एक वर्ष तक अध्ययन किया। शुरूआत छह अक्तूबर 2020 हुई। निष्कर्ष को बृहस्पतिवार को जारी किया गया। उन्होंने कहा कि जंगल में मानव अपनी अनावश्यक दखलअंदाजी न करें तो टाइगर सुरक्षित रहेंगे। मानव जाति के लिए भी कोई खतरा पैदा नहीं होगा।
विज्ञापन

एसआरएम इंटर कॉलेज में कमेस्ट्री के लेक्चरर टीएच खान ने बताया कि टाइगर रिजर्व के आसपास के 50 गांवों में उन्होंने अध्ययन किया। इस दौरान पता लगा कि जब से टाइगर की संख्या में इजाफा हुआ है तब से नीलगायों का आतंक कम हो गया है। फसलें कम नष्ट हो रही हैं। अगर टाइगर होते हैं तो एक से दो किलोमीटर तक नीलगाय नजर नहीं आती। जिस जगह टाइगर होता है वहां तेंदुआ भी नहीं आता। शायद यही वजह है कि तेंदुआ जंगल से बाहर आबादी क्षेत्र में घूम रहा है। इसीलिए किसानों ने टाइगर को अपना मित्र बताया है लेकिन तेंदुए के हमलों से किसान परेशान हो रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक टाइगर का स्वभाव कतई नहीं बदला है। जो लोग कहते हैं कि टाइगर मानव के प्रति अधिक आक्रामक और हमलावर हो गए हैं, ऐसा अध्ययन के दौरान सामने नहीं आया। एक और निष्कर्ष सामने आया है जो टाइगर जंगल में घूम रहे हैं उनमें और जंगल के बाहरी क्षेत्र में गन्ने के खेतों में डेरा जमाने वाले टाइगर जिन्हें शुगर केन टाइगर का नाम दिया गया है, उन दोनों के स्वभाव में अंतर है। जंगल के टाइगर को रिजर्व क्षेत्र में मानव का प्रवेश बर्दाश्त नहीं है। वह मानव को देखकर या तो रास्ता बदल देता है या फिर बचने और छुपने का प्रयास करता है। लेकिन जो टाइगर खेत खलिहान के आसपास घूमते हैं। वह मानव के प्रति हमलावर नहीं हैं। इसका उदाहरण शुक्ला फार्म और पंडरी में देखने को मिला। कुछ लोगों ने बताया कि वे अपने खेत में मच्छरदानी लगाकर सोते रहे और टाइगर बगल से निकल गया। सुबह पद चिह्न देखकर वन कर्मियों ने टाइगर के गुजरने की पुष्टि की।
क्यों किया गया अध्ययन
सेव इनवायरमेंट वेलफेयर सोसाइटी के सचिव टीएस पाल ने बताया कि वर्ष 1997-98 में इस क्षेत्र में कुछ ही टाइगर हुआ करते थे, वह नेपाल और सुरई रेंज की ओर से आते थे लेकिन 2014 में टाइगर रिजर्व बनाया गया। टाइगर को संरक्षण मिला। इसलिए उनकी संख्या बढ़ी। अब वन विभाग के रिकॉर्ड में 65 टाइगर हैं। लेकिन इस बीच टाइगर के हमले में कुछ लोगों की जान गई। जब लोगों की जान गई तो यह प्रचार किया जाने लगा कि टाइगर हमलावर हो गए हैं। इस प्रचार की हकीकत समझने के लिए अध्ययन किया गया। इसमें साफ हो गया है कि टाइगर का स्वभाव नहीं बदला है। वन्य जीव के क्षेत्र और रहन-सहन में मानव तथा उसके वाहनों की अनावश्यक दखलअंदाजी से हमले की घटनाएं हुईं हैं।
विज्ञापन

कौन कौन रहा सहयोगी
अध्ययन के दौरान बैंक अधिकारी अशोक शर्मा, नवाज खुसरो शेरपुर, निरंजपाल, सचिन सरकार, नसीम हसनी, अमित सक्सेना आदि ने सहयोग दिया। बिना किसी सरकारी मदद के अध्ययन किया गया। एसडीओ सतेंद्र चौधरी ने सहयोग दिया। इसके अलावा उत्तरकाशी के डीएफओ बाबूलाल, फील्ड डायरेक्टर रहे एच राजमोहन मददगार रहे। डीएफओ नवीन खंडेलवाल ने भी सहयोग प्रदान किया।
अध्ययन के दौरान कई बार रातों को जागकर लकड़ी के मचानों पर बैठना पड़ा। लोगों से मिलकर संवाद किया गया। टाइगर की संख्या बढ़ने से जंगल के आसपास रहने वाले लोग भयभीत हो रहे थे। ऐसे में मानव और वन्यजीव के बीच संघर्ष के हालात पैदा होने का अंदेशा था। इन हालातों को रोकने के लिए टाइगर के स्वभाव पर अध्ययन किया गया। निष्कर्ष के विषय में शासन को अवगत कराएंगे।
विज्ञापन

टीएच खान, अध्ययनकर्ता
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें