पीलीभीत। श्रावस्ती में बीज अनुदान घोटाला पकड़े जाने के बाद अब शासन ने पूरे प्रदेश में बीज अनुदान वितरण की जांच कराने के आदेश दिए हैं। पीलीभीत में भी तीन साल में किसानों को 2.41 करोड़ का बीज अनुदान दिया गया। मगर, अधिकांश सरकारी अनुदान वितरण केवल कागजों तक ही सीमित रहा। अनुदान का बड़ा हिस्सा दलाल, अफसरों के चहेते किसान या फिर बिचौलिये हड़प गए। कृषि विभाग ने कभी भी उन किसानों की सूची सार्वजनिक नहीं की, जिनको अनुदान दिया गया। हालांकि अब कृषि विभाग के अफसर अनुदान वितरण का डाटा एकत्र करने में जुटे हैं।
राज्य सरकार समय-समय पर किसानों को जैविक खेती के प्रोत्साहन के लिए बीज पर 50 से 90 फीसदी तक अनुदान देती है। इसके लिए किसानों को ब्लॉक स्तर पर पंजीकरण कराना होता है। किसान को आधार कार्ड और चालू खाते की छायाप्रति देनी होती है। इसी से उनके खाते में अनुदान की राशि पहुंचती है। कृषि विभाग के अफसर किसानों के नाम पर कुछ दलाल और बिचौलिये सेट कर लेते हैं। उनकी सूची बनाकर अनुदान खातों में भिजवा देते हैं। इसीलिए बीज अनुदान लेने वाले किसानों की सूची सार्वजनिक नहीं की जाती। इसका परिणाम यह होता है कि असली किसान तो अनुदान वाले बीज लेने से वंचित रह जाते हैं। अपात्रों से मिलकर सरकारी सिस्टम ही उसका फायदा उठा लेता है।
श्रावस्ती में हुए घोटाले के बाद शासन ने तीन साल में दिए गए बीज अनुदान की जांच कराने के निर्देश दिए हैं। तबसे कृषि विभाग के अफसरों में हड़कंप मच गया है। अफसरों ने जब ब्लॉक वार अनुदानित बीज वितरण का डाटा निकलवाया तो उसमें पता चला कि खरीफ फसलों के लिए 2016-17 से 2019-20 तक 14017 किसानों को 69.23 लाख का बीज अनुदान दिया गया। रबी फसल के लिए वर्ष 2016-17 से वर्ष 2018-19 तक 14384 किसानों को 1.72 करोड़ रुपये का बीज अनुदान दिया गया। कुल मिलाकर तीन साल में किसानों के नाम पर 2.41 करोड़ का बीज अनुदान सिर्फ कागजों पर मिल गया। मगर, हकीकत इसके विपरीत है। अगर बीज अनुदान पात्र किसानों को मिला होता तो कृषि विभाग उन किसानों की सूची सार्वजनिक करता।