पीलीभीत। अंकित की मौत उन तमाम युवाओं को सबक दे रही है जो हकीकत की दुनिया में रहने के बावजूद सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में खोए रहते हैं। स्कूल हो या कॉलेज या फिर अपना घर या दफ्तर, जैसे ही युवा वर्ग को थोड़ा सुकून भरा वक्त मिलता है कि वह फेसबुक और व्हाट्सएप पर चैट करना नहीं भूलते। इंस्टाग्राम और ट्वीटर भी ऐसे प्लेटफार्म है जहां युवा अपना काफी समय दे रहे हैं। सोशल मीडिया के प्लेटफार्मों के आप कब लती हो गए? इसका अहसास शुरूआत में आपको भी नहीं हो पाता। लत बढ़ी तो व्यस्तता बढ़ी और आप सबके बीच रहने के बावजूद एकाकी होते चले जाते हैं। परिवार में संवाद घटने लगता है और इससे अवसाद का जन्म होता है। इस स्थिति को देखते हुए जिला अस्पताल के मन कक्ष की साइको थेरेपिस्ट पल्लवी सक्सेना का कहना है कि आभासी दुनिया में इतना न डूब जाएं कि आपके अपने करीबी ही दूर हो जाएं। पल्लवी सक्सेना ने बताया कि कम से कम एक घंटे औसतन हर रोज युवाओं का सोशल मीडिया पर खर्च हो रहा है। कई युवा तो इस कदर लती हो गए हैं कि उन्हें वक्त का पता नहीं चल पाता। दैनिक कामकाज, पढ़ाई और नौकरी से अगर थोड़ा सा भी समय बचता है तो सोशल मीडिया पर उसे खपा देते हैं। उन्होंने बताया कि करीब 10-15 केस प्रतिमाह मोबाइल एडिक्ट युवाओं के आ रहे हैं। इसमें अधिकतर काउसिंलिंग से ठीक हो रहे हैं।
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अगर हकीकत की दुनिया में रहेंगे तो अपने पराये दोनों सामने होंगे और जरूरत पर अपने लोग काम आएंगे लेकिन आभासी दुनिया ऐसी होती है कि जरूरत के वक्त भी संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता है। मैं तो यही कहूंगी कि युवाओं से ज्यादा उनके घर परिवार के बड़ों को ध्यान देना है। वे युवाओं और किशोरों के साथ बैठें और खेलें तथा भोजन भी करें। इससे अपनापन बढ़ेगा और काल्पनिक दुनिया के आदी हो रहे युवा हकीकत की दुनिया में दिखेंगे। - डॉ. अनीता चौरसिया, सीएमएस जिला महिला अस्पताल
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काश हम अपने बच्चों को समझें और उन पर ध्यान दें ताकि ऐसी घटनाएं आगे न होने पाएं। मैं जानती हूं कि अंकित की मौत आभासी दुनिया के खतरों से वाकिफ करा रही है। अब बड़ों की जिम्मेदारी है कि वे अपने घर परिवार के बच्चों को बचपन से ही काल्पनिक दुनिया और हकीकत की दुनिया का अंतर समझाएं। - पल्लवी सक्सेना, साइको थेरेपिस्ट
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किन बातों पर देना है ध्यान
माता-पिता या बड़े भाई अपने बेेटे बेटियों के सोशल मीडिया एकाउंट पर निगरानी रखें
अगर आपका बेटा और बेटी सोशल मीडिया का लती होने लगे तो काउसिलिंग कराएं
बचपन से मोबाइल की आदत न डलवाएं, कविता कहानी खुद सुनाएं या किताबें दिलाएं
बच्चों का दोस्तों से संवाद बनाए रखें ताकि आपको अपने बेटे-बेटी के विषय में पता चलता रहे
अपने युवा बेटे बेटियों के सोशल मीडिया एकाउंट में रिश्तेदारों के बेटे बेटियों को भी जोड़ सकते हैं
ऐसा होने पर आपको अपने बेटे और बेटी के मिजाज का पता चलता रहेगा
बच्चों के सामने आप हैं तो खुद भी अधिक देर तक मोबाइल पर व्यस्त न रहें
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अंकित नहीं रहा, सिर्फ यादें बचीं...अब सीने से कपड़े लगाकर रो रहीं हैं मां और बहन
बीसलपुर। बीस वर्ष का अंकित अब दुनिया में नहीं रहा। उसने शुक्रवार को जहर खाकर आत्महत्या की थी। पूरा परिवार दुखी है लेकिन मां और बहनें अंकित के कपड़े सीने से लगाकर उसकी यादों में खो जाती हैं और बार-बार रोने लगती हैं। उन्हें धैर्य बंधाना भी मुश्किल हो रहा है। सांत्वना देने वालों का तांता रविवार को भी लगा रहा।
गांव खांडेपुर निवासी 20 वर्षीय छात्र अंकित गंगवार पुत्र पुष्प कुमार ने 10 जून को दोपहर में बीसलपुर आकर बस स्टैंड चौराहे के पास जहर (कीटनाशक दवा) खा लिया था। उसे पहले सीएचसी में भर्ती कराया गया। हालत गंभीर होने पर उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया जहां उसकी मौत हो गई। पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के बाद शनिवार शाम शव घरवालों को सौंप दिया। उसके बाद गमगीन माहौल में शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया, जिसमें खांडेपुर और आसपास के कई गांवों और नगर के बहुत से लोगों ने भाग लिया। अंकित की माया देवी, बहन रोशनी और चांदनी की आंखों के आंसू रोते-रोते सूख गए हैं। रिश्तेदार और गांव की महिलाएं उन्हें सांत्वना दे रही हैं लेकिन बार-बार वे अंकित की यादों में खो जाती हैं।
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पढ़ाई के लिए न डालें दबाव
- अभिभावक अपने बच्चों पर पढ़ाई के लिए ज्यादा दबाव न डालें। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अभिभावकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए पढ़ाई करें। ऐसे आत्मघाती कदम न उठाएं जो पूरे परिवार को दुख देेते हैं। - डॉ. अंशुमान भदौरिया, प्राचार्य सूरजभान डिग्री कालेज बीसलपुर
बनाए रखें संवाद
अभिभावक बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें। समाज और अभिभावकों द्वारा सकारात्मक विचार युवा वर्ग को दिए जाएं तो वे कभी हतोत्साहित नहीं होंगे। बच्चों को प्रारंभ से ही अच्छी संगत दी जानी चाहिए। - डॉ. ममता अग्रवाल, प्राचार्य, बाला देवी रोशनलाल कॉलेज ऑफ हायर स्टडीज, बीसलपुर
न थोपें अपनी इच्छाएं
खांडेपुर की घटना जानकर काफी दुख हुआ। मैं अभिभावकों से निवेदन करता हूं कि वे लोग अपनी इच्छाएं बच्चों पर न थोपें। बच्चों से मित्रवत व्यवहार करें। बच्चा जब किशोर अवस्था में प्रवेश करता है,तो उसमें शारीरिक मानसिक बदलाव होने लगते हैं। अभिभावक बच्चों की इच्छाओं का भी ख्याल रखें। - डॉ. वीके सिंह, प्राचार्य कृष्णा नरेश महाविद्यालय गौहनिया
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बच्चों के साथ करें नम्रतापूर्ण व्यवहार
अभिभावक बच्चों के साथ नम्रतापूर्ण व्यवहार रखें। बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें। घरेलू समय, मोबाइल, टेलीविजन पर न बिताएं बल्कि आपस में बात करें। - डॉ. अनुरेखा चौहान प्राचार्य, आदेश महिला डिग्री कॉलेज नरायनपुर