पीलीभीत। टिश्यू कल्चर तकनीक अपनाकर तराई क्षेत्र के बेरोजगार युवा कृषि वानिकी क्षेत्र में रोजगार पा सकते हैं। वानिकी स्नातक श्याम सुंदर टिश्यू कल्चर तकनीक को बढ़ावा देने में जुटे हैं। उनकी इस प्रतिभा को देखते हुए उत्तर प्रदेश वन अनुसंधान संस्थान की प्रयोगशाला में उन्हें काम करने का मौका दिया गया है। श्याम सुंदर इस तकनीक का जिले में विस्तार करना चाहते हैं। शिक्षित बेरोजगार इस तकनीक के माध्यम से टिश्यू कल्चर के माध्यम से हजारों पौधे तैयार कर इसको रोजगार का माध्यम बना सकते हैं। श्याम सुंदर जैविक खेती को भी बढ़ावा देने में जुटे हैं।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से वानिकी में स्नातक कर चुके श्यामसुंदर परंपरागत खेती को आधुनिक बनाने की मुहिम में जुटे हैं। अमरिया तहसील के गांव विलासपुर में रहने वाले किसान परिवार में जन्में श्यामसुंदर इससे पूर्व मृदाविहीन खेती के मॉडल को विकसित कर चुके हैं। जिले के अलावा पूरे प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने का सपना संजोएं श्यामसुंदर एक पौधे के टिश्यू कल्चर से हजारों कृत्रिम पौधे तैयार करने में जुटे हैं। खास बात यह है कि उनकी इस लगन को देखते हुए उत्तर प्रदेश वन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. कुलविला थामस ने टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला में बल्बूसा बालकोआ (बांस की प्रजाति) पर कार्य करने की अनुमति दे दी। तभी से वह इस प्रयोगशाला में एक पौधे के टिश्यू (ऊतक) से हजारों कृत्रिम पौधे उगाने में लगे हैं।
वनों का क्षेत्रफल और रोजगार बढ़ाने में मिलेगा सहयोग
श्याम सुंदर ने बताया कि वनों के घनत्व में आ रही कमी को पूरा करने के लिए टिश्यू कल्चर तकनीक खासी लाभकारी है। इस तकनीक से एक वर्ष में लाखों पौधों की नर्सरी तैयार की जा सकती है। श्यामसुंदर के मुताबिक वर्तमान में बम्बूसा बालकोआ और बम्बूसा एसपर (खाने वाला बांस) को टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार कर रहे हैं। टिश्यू कल्चर के माध्यम से विलुप्त प्राय प्रजातियों के संरक्षण, संवर्धन के साथ नई व उन्नत किस्म तैयार की जा सकती है। शिक्षित बेरोजगार युवा टिश्यू कल्चर लैब स्थापित कर अपना कारोबार शुरू कर सकते हैं। केला, बांस की प्रजातियों समेत अधिकांश औषधीय पौधे की टिश्यू कल्चर विधि से तैयार की गई नर्सरी की खासी मांग है।
क्या होती है प्लांट टिश्यू कल्चर तकनीक
टिश्यू कल्चर तकनीक में पौधे के टिश्यू (ऊतकों) का एक छोटा टुकड़ा उसके बढ़ते हुए ऊपरी हिस्से से लिया जाता है। इस टुकड़े को एक जैली में रखा जाता है, जिसमें पोषक तत्व और प्लांट हार्मोन होते हैं। यही हार्मोन पौधे के ऊतकों में कोशिकाओं को तेजी से विभाजित करते हैं और नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। सभी कोशिकाओं को एक जगह एकत्र किया जाता है। जिसे कैलस कहते हैं। कैलस को दो बार अलग-अलग जैली में स्थानांतरित किया जाता है। जड़ और तने के साथ ही एक छोटे पौधे के रूप में अलग कर मिट्टी में प्रत्यारोपित किया जाता है। कुछ मूल पौधों की मदद से टिश्यू कल्चर के माध्यम से हजारों पौधों की नर्सरी तैयार की जा सकती है।
टिश्यू कल्चर तकनीकी से खेती के फायदे
इस तकनीक के माध्यम से किसान कीट व रोग मुक्त पौधों की नर्सरी तैयार कर सकते हैं। पौधों में एक के बाद एक यानी दो अंकुरण मिलते हैं। इससे खेती की लागत में भी कमी आएगी। पौधों का एक समान विकास होने से पैदावार भी बढ़ाई जा सकती है। तकनीक के माध्यम से पूरे साल पौधों को विकसित किया जा सकता है। इस पर किसी भी मौसम का कोई असर नहीं होता है। खास बात यह है कि नए पौधों को विकसित करने के लिए बहुत कम स्थान की आवश्यकता होती है, और यह बाजार में नई किस्मों के उत्पादन को गति देने में मदद करता है।