मुजफ्फरनगर। सरकार द्वारा लगातार महिला हिंसा के मामले रोकने के प्रयासों के बावजूद सोशल मीडिया बेलगाम होते हुए इस तरह के मामलों को बढ़ावा दे रहा है। नतीजतन, महिला हिंसा रोकने के सरकार के तमाम प्रयास नाकाफी हो रहे हैं।
वर्तमान में महिला थाने में घरेलू हिंसा की एक सौ से अधिक शिकायतें लंबित हैं, जबकि हर सप्ताह करीब छह से सात नई शिकायतें महिला थाने में पहुंच रहीं हैं। वहीं, वन स्टॉप सेंटर में भी एक दर्जन से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि नए मामले भी लगातार सामने आते रहते हैं। महिला हिंसा रोकने के लिए कई महिला संगठन भी लगातार काम कर रहे हैं। शिक्षा का स्तर बढ़ने से महिलाएं भी अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हुईं हैं, लेकिन इसके बावजूद महिला हिंसा के मामलों में इजाफा होना कहीं न कहीं सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को गंभीरता से लागू न कर पाने के साथ ही सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर हो रहा प्रसार भी बड़ी वजह मानी जा रही है।
सरकार चला रहीं ये योजनाएं
महिला हिंसा को रोकने लिए सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रहीं हैं। इनमें स्कूली छात्राओं को जागरूक करने के लिए मिशन शक्ति और एंटी रोमियो स्क्वॉड, महिलाओं के लिए महिला हेल्प लाइन 1090 और घरेलू हिंसा के मामले रोकने लिए वन स्टॉप सेंटर 181 संचालित किए जा रहे हैं।
हर शिकायत घरेलू हिंसा से संबंधित
महिला थाने में वर्तमान में एक सौ से अधिक महिला हिंसा की शिकायतें लंबित हैं। महिला थाना प्रभारी इंस्पेक्टर संध्या वर्मा कहती हैं कि इनमें से अधिकांश शिकायतें घरेलू हिंसा की ही होती हैं। इस तरह की शिकायतों में दोनों पक्षों को बुलाकर समझौता कराए जाने के हरसंभव प्रयास किए जाते हैं, लेकिन जहां लगता है कि समझौता नहीं हो पाएगा, वहां मुकदमे भी दर्ज किए जाते हैं। समझौता प्रक्रिया के दौरान अधिकांश मामलों में पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद की स्थिति साफ नजर आती है, जिन्हें घरेलू हिंसा का रूप दे दिया जाता है।
अन्याय के खिलाफ लड़ें, नारीत्व न खोएं
चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की अध्यक्ष बीना शर्मा का कहना है कि सोशल मीडिया महिला हिंसा को बढ़ावा दे रहा है। महिलाओं के प्रति जो पोस्ट सोशल मीडिया पर चल रहीं हैं, उन्हें देखकर नकारात्मक विचार आते हैं। घरेलू हिंसा के मामले इसलिए अधिक दिखते हैं क्योंकि पहले महिलाएं मुखर नहीं थीं, वे चुपचाप बस कुछ बर्दाश्त करती थीं। अब बदलते माहौल में महिलाएं खुलकर विरोध कर रहीं हैं। कई बार इसकी आड़ में गलत निर्णय भी लिए जाते हैं, इसलिए महिलाओं से यही कहना है कि अन्याय के विरोध में आवाज उठाइये, लेकिन नारीत्व न खोइये।
घरेलू हिंसा में मारपीट कम, सामंजस्य की कमी
वन स्टॉप सेंटर प्रभारी पूजा वर्मा का कहना है कि महिलाएं पहले चुप रहती थीं, लेकिन अब खुलकर सामने आ रहीं हैं। 50 फीसदी महिलाएं अब समाज के सामने आकर शिकायतें करने लगीं हैं, जिनका निस्तारण भी किया जा रहा है। अधिकांश घरेलू हिंसा के मामलों में मारपीट कम होती है, पति-पत्नी के बीच आपसी सामंजस्य नहीं हो पाता। इसके लिए जरूरी है कि पति-पत्नी के बीच सही तरीके से काउंसिलिंग कराई जाए।
समाज का शिक्षित होना जरूरी
डॉ. रिंकू एस गोयल का कहना है कि महिला हिंसा रोकने के लिए समाज का शिक्षित होना जरूरी है। परिवार या महिलाएं शिक्षित होगी तो वें स्वाभिमानी होगी। कहीं न कहीं मीडिया पर चीजें बेहतर हुईं हैं। इससे महिलाओं की मानसिकता भी बदली है। दांप्तय जीवन में पहले एक से ही जुड़ाव रहता था, अब सब चीजें खुल गईं हैं। इससे कहीं न कहीं पति-पत्नी के बीच भी कुछ चीजें गलत हुईं हैं, जो घरेलू हिंसा की श्रेणी में आती हैं।