मुजफ्फरनगर/भोपा। दीपावली पर पूर्व में लगभग सभी घरों में मिट्टी के दीये जलाकर सजावट की जाती थी, जो आधुनिकता की दौड़ और बढ़ती महंगाई के चलते अब लगभग सीमित हो चुकी है। मिट्टी के दीयों का स्थान अब इलेक्ट्रिक और फैशनेबल झालर ले चुकीं हैं। जिसके चलते लगातार मिट्टी के दीयों की मांग कम होती जा रही है।
वहीं कारीगरों के सामने मिट्टी न मिलने की समस्या होने के साथ ही उनकी मेहनत का उचित मोल नहीं मिलना भी उत्पन्न हो रही है। जिसके चलते इसी कला के सहारे जीवन-यापन करना मुश्किल होता जा रहा है। भोपा निवासी रामपाल प्रजापति बताते हैं कि उनके यहां दीपावली पर मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का कार्य तीन पीढ़ियों से होता आ रहा है। उन्होंने भी मात्र 14 साल की उम्र में मिट्टी के बर्तन व दीये बनाने का काम सीखकर करना शुरू कर दिया था। पहले उनके बाबा मुखराम और फिर पिता फूलसिंह इस काम के अच्छे कारीगर रहे हैं, लेकिन अब उनके बाद नई पीढ़ी इस कला से मुंह मोड़ रही है।
इसके अलावा सरसों के तेल के आसमान छूते दाम के चलते इस बार दीयों की मांग काफी कम है। भोपा निवासी रामपाल व महिपाल सिंह का कहना है कि बढ़ती महंगाई के चलते लोग अब इलेक्ट्रिक झालर व लड़ियों से घर सजा रहे हैं।