मुजफ्फरनगर। रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बांधने वाली बहन को हमेशा स्नेह, सुरक्षा और जिम्मेदारी के पारंपरिक रिश्ते से जोड़ा जाता रहा है। बदलते समय के साथ इस रिश्ते की तस्वीर भी बदल रही है। अब बहनें केवल भाई से अपनी रक्षा का वचन नहीं ले रहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुद उसकी ढाल बनकर खड़ी हो रही हैं। भाई के भविष्य की चिंता हो या परिवार की जिम्मेदारी में सहयोग की जरूरत तो बहनों ने अपने सपनों और सुविधाओं से समझौता कर भाइयों का साथ निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
भाई की जिंदगी के लिए निज जीवन को किया दरकिनार
रामपुरी की रहने वाली अपर्णा अग्रवाल 2012 में बीटेक की पढ़ाई कर रहीं थीं तो उनके उनके भाई को गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया। बीमारी के इलाज में लगातार बढ़ते खर्च ने परिवार की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ाया तो अपर्णा पिता के साथ दूसरे बेटे की तरह खड़ी हो गईं। पढ़ाई जारी रखने के साथ उन्होंने नौकरी शुरू की और परिवार के खर्च में पिता का हाथ बंटाया। इसी बीच मां का देहांत होने से कष्ट और जिम्मेदारी और बढ़ती चली गई।
भाई की बीमारी से परिवार आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है। ऐसे में अपर्णा ने अपनी जिंदगी के फैसलों को भी परिवार की परिस्थितियों के अनुसार ढाला। उन्होंने शादी नहीं की, ताकि भाई की बीमारी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच किसी तरह की परेशानी न आए। वह कहती हैं कि उनके लिए भाई का साथ और परिवार की जिम्मेदारी निजी इच्छाओं से बड़ी है।
-
भाइयों को पढ़ाने के लिए 18 साल की उम्र में बनीं समूह सखी
जानसठ क्षेत्र के खलवाड़ा गांव की रहने वाली रचना किसान परिवार से हैं। पिता खेती करते हैं। छोटे भाइयों की बेहतर पढ़ाई की चिंता ने रचना को महज 18 साल की उम्र में आत्मनिर्भर बनने की राह पर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। वह बीए में दाखिला लेने के साथ स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं और मेहनत कर परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटा रही हैं। उनके पिता नरेंद्र ने बताया कि जिस उम्र में आमतौर पर लड़कियां अपने भविष्य के बारे में सोचती हैं, उस उम्र में रचना भाइयों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए मेहनत कर रही हैं।