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बाज रही थी मथुरा मुरली, खेल रहे थे वृंदावन में हाली...नहीं देते सुनाई

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-अब गांवों में सुनाई नहीं देती होली गीतों की गूंज
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संजय गर्ग
चरथावल। बदलते परिवेश में बाज रही थी मथुरा मुरली, खेल रहे थे जी सब वृंदावन में होली.. के लोकगीतों की मधुर लहरी विलुप्त हो गई हैं। स्मार्ट फोन के चलन ने सामाजिक परंपराओं को ग्रहण लगा दिया है। समरसता के पवित्र पर्व पर ‘चेहरा’ देखकर गुलाल लगाने का चलन हावी है।
फाल्गुन में होली की मस्ती अब अदृश्य होती जा रही है। बच्चों और यूथ की टोलियां महीने भर पहले पहले गली-मोहल्लों में होलिका दहन के लिए लकड़ी और चंदा एकत्र करने में जुट जाते थे। जात-पात से दूर सामाजिक सद्भाव के साथ होली खेली जाती थी। महिलाएं कई दिन पहले से होली के लोकगीतों में खो जाती थी। आज ब्रज में होली रे रसिया, कहीं घनी कहीं थोड़ी से रसिया की गूंज नहीं सुनाई देती। महिलाओं और बच्चों के हाथों में स्मार्ट फोन की लत से परंपराओं पर ग्रहण लगा है। छिमाऊ की 80 वर्षीया नानकी देवी कहती हैं कि करीब एक दशक से एकल परिवारों में त्योहार की मस्ती रस्म अदायगी बनती जा रही है। बलवाखेड़ी की 70 साल की शिमला कहती हैं कि होली सीजन में महिलाओं की सामूहिक टोलियां में होली गीत गाती थी। इसी गांव की बुजुर्ग महिला सुशीला कहती हैं कि मैं कैसे खेलूंगी, सांवरियां मेरे गल सै, सांवरिया मेरे साथ में, राजाजी मेरे साथ में...कल की बात हो चुकी है। होली से पहले खेतों से फूलों को लाकर घरों में बिखेरने की परंपरा दम तोड़ गई है। किसान जयप्रकाश त्यागी का मंतत्य है मस्ती और प्यार के पर्व होली का उत्साह गायब हो गया है। लोग दुश्मनी निकालने लगे हैं। दंगल और लाठी डंडों को प्रदर्शन बंद हो चुका है। चंद्रशेखर आजाद पीजी कॉलेज की प्राचार्या सत्यावती कहती हैं कि सामाजिक सद्भाव, पंरपरा, आस्था और अस्मिता को जीवत रखने के लिए होली का पर्व भेदभाव भूलाकर मनाना चाहिए।
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गले में मेवे की माला पहनने का चलन
चरथावल। कस्बे एवं देहात में होली सजाने के साथ कुछ परंपराएं महिलाएं गोबर से होलिका दहने के लिए बरकुल्ले बनाने में जुटी है। बदले जमाने में वहीं बच्चों के होली से पहले गृहिणियों ने बच्चों के आकर्षण का केंद्र ड्राई फ्रूटस और लड्डुओं की मालाओं में चॉकलेट, टॉफी, अंकल चिप्स को भी शामिल कर रही है। होलिका पूजन के दिन गले में मेवा की मालाएं पहनकर बच्चे इतराते नजर आते हैं।
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परीक्षाओं के सीजन से उल्लास फीका
चरथावल। ‘यूथ’ को शिक्षा का बोझ परंपरागत पर्वों से दूर करता जा रहा है। इस बार होली के दिनों में सीबीएसई, बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाओं से होली का हुड़दंग को नजर नहीं आ रहा है। गली मोहल्लों में हफ्ते भर पहले शुरू होने वाला होली का रंग अभी बच्चों और युवाओं पर नहीं है। छात्र आकाश त्यागी, युवराज, अनंत त्यागी, अर्पित कहते हैं कि बोर्ड की परीक्षाएं और भारी भरकम कोर्स भी होली के जश्न में बाधक बन रही है।
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