मुजफ्फरनगर। मीरापुर उपचुनाव के नतीजों की घड़ी आ पहुंची है। 2009 के बाद जीत से दूर हुई पूर्व विधायक मिथलेश पाल की वापसी रालोद के वजूद का भी इम्तिहान है। भाजपा के साथ नए गठबंधन में हुए चुनाव से 2027 के समीकरण बनेंगे। सपा से सुम्बुल राना को जीत मिली तो जिले की मुस्लिम राजनीति को नई उर्जा मिल सकती है।
उपचुनाव में भाजपा के कोटे से रालोद का टिकट हासिल करने वाली मिथलेश पाल ने लंबा सियासी दौर देखा है। बसपा के टिकट पर 1995 में जिला पंचायत सदस्य चुनी गई थी। 2009 में मोरना विधानसभा के उपचुनाव में जीतकर विधानसभा पहुंची। इसके बाद तीन विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन दोबारा जीत नहीं मिली। वह भाजपा में शामिल हो गई थी।
समीकरण बदले तो एक बार फिर उन्हें मीरापुर से उपचुनाव लड़ने का मौका मिला। देखने वाली बात यह होगी कि 15 साल बाद विधानसभा में उनकी वापसी होगी या नहीं। भाजपा के साथ नए गठबंधन में मीरापुर सीट रालोद के हिस्से में आई। 2027 की तैयारी में जुटे रालोद के लिए उपचुनाव असल में वजूद का इम्तिहान है। मीरापुर में जीत मिली तो पश्चिम यूपी में सीटों के बंटवारे में रालोद की दावेदारी बढ़ेगी। यही वजह है कि रालोद ने पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ाया है।
सपा प्रत्याशी सुम्बुल राना की हार-जीत से 2027 में सपा की मुस्लिम राजनीति के समीकरण भी तय हो जाएंगे।