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Muzaffarnagar News: विवाहिता की याचिका स्वीकृत, सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश किए गए रद्द, डीएम को भेजा पत्र

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मुजफ्फरनगर। शहर की एटूजेड कॉलोनी में ससुराल के गेट पर धरने से उठाकर विवाहिता शिल्पा, उसके भाई हिमांशु और भाभी को शांति भंग में जेल भेजने के मामले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। नगर मजिस्ट्रेट की ओर से पारित धारा 130 के तहत नोटिस और उसके परिणामस्वरूप धारा 135(3) बीएनएसएस के तहत आदेश रद कर दिए गए। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या- तीन के पीठासीन अधिकारी अनुराग पंवार ने लिखा कि देश के नागरिक इससे बेहतर के हकदार हैं कि उन्हें किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से रबर की मुहर के माध्यम से दर्ज की गई संतुष्टि के कारण जेल जाना पड़े, जो देश के कानून की घोर अवहेलना है।
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याचिकाकर्ताओं में से दो महिलाएं हैं। यह समझ से परे है कि इन दोनों महिलाओं ने ऐसा अपराध कैसे किया होगा, जिसके कारण कार्यपालिका मजिस्ट्रेट को इस प्रकार की कार्रवाई करनी पड़ी और उन्हें जेल में डाल दिया गया। अदालत ने डीजीसी राजीव शर्मा के माध्यम से डीएम को अग्रिम कार्रवाई के लिए पत्र भेजा है।
इसी साल शिल्पा ने ससुराल में घर के बाहर धरना दिया था। 20 मई को नई मंडी कोतवाली के एसआई शुभम कुमार मौके पर पहुंचे और शांति भंग की धाराओं में तीनों का चालान कर दिया। तत्कालीन मजिस्ट्रेट ने न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया था। अगले दिन तीनों को जमानत मिल गई। जेल से छूटने के बाद तीनों ने सेशन न्यायालय में याचिका दाखिल की थी, जिसकी सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या- तीन में हुई।
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अधिवक्ता अश्वनी कुमार शर्मा ने बताया कि अदालत ने याचिका स्वीकृत कर ली है। अदालत ने माना है कि कुछ ही घंटों में पूरी की गई यह पूरी प्रक्रिया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को कारण बताने का वास्तविक अवसर दिए बिना ही उन्हें जेल में हिरासत में रखने का आदेश पारित किया गया, अन्यायपूर्ण, मनमानी, गैरकानूनी और अमान्य है। यह प्रशासनिक स्वीकृति के साथ अवैध हिरासत के समान है।

मजिस्ट्रेट भूल गए कि यहां लोकतंत्र
अधिवक्ता ने बताया कि अदालत ने कहा कि अनुचित बात यह है कि याचिकाकर्ताओं को इस शर्त पर जमानत पर रिहा किया गया है कि वह 26 मई से प्रतिदिन न्यायालय में उपस्थित होंगे। ऐसी अजीब शर्त, वह भी महिलाओं पर, न तो स्वीकार्य है और न ही उचित। कार्यपालक मजिस्ट्रेट इस तथ्य को पूरी तरह से भूल चुके हैं कि वह लोकतंत्र में कार्य कर रहे हैं, तानाशाही में नहीं। कार्यपालक मजिस्ट्रेट और पुलिस ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो वह कानून से ऊपर हों और ईश्वर द्वारा नियुक्त हों।
पुलिस और कार्यपालक मजिस्ट्रेट दोनों मिलकर याचिकाकर्ताओं को किसी भी तरह जेल भेजने के उद्देश्य से काम कर रहे थे। नोटिस के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट के कार्यालय ने पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को हूबहू कॉपी किया और केवल अपनी संतुष्टि व्यक्त करते हुए उक्त कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि नोटिस को साइक्लोस्टाइल से कॉपी किया गया है और यांत्रिक रूप से जारी किया गया है।
नई मंडी थाने के सब इंस्पेक्टर शुभम चौहान ने बिना किसी सूचना के और अपनी मर्जी से धारा 170 के तहत याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया।
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इसलिए भेज दिया गया था जेल
सब इंस्पेक्टर शुभम चौहान ने धारा 135(3) बीएनएसएस के तहत अपना टाइप किया हुआ बयान प्रस्तुत किया और नगर मजिस्ट्रेट ने धारा 135(3) बीएनएसएस के तहत एक आदेश पारित कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को जांच लंबित रहने के दौरान शांति बनाए रखने के लिए एक लाख रुपये का बांड और समान राशि के दो जमानती पेश करने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ताओं द्वारा बांड और जमानती प्रस्तुत न कर पाने के कारण उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया। पुलिस के लिए धारा 170 बीएनएसएस के तहत रिपोर्ट में यह उल्लेख करना अनिवार्य है कि गिरफ्तार व्यक्ति की ओर से कौन सा संज्ञेय अपराध किया गया होता, ताकि ऐसे अपराधों को रोका जा सके। साथ ही, एसएचओ द्वारा विश्लेषणात्मक और तथ्यात्मक टिप्पणियों के साथ रिपोर्ट अग्रेषित की जानी चाहिए।
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