सत्संग नहीं, स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए गीता : मोरारी बापू
मोरना (मुजफ्फरनगर)। तीर्थनगरी शुकतीर्थ में गंगा तट पर चल रही श्रीराम कथा में शुक्रवार को कथाव्यास मोरारी बापू ने गीता जयंती पर श्रीमद्भागवत गीता का बखान किया। संत प्रवर ने कहा कि गीता सत्संग नहीं, बल्कि स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए।
शुकतीर्थ में गंगा तट पर चल रही श्रीराम कथा में प्रवचन करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि जिस देश में वेद (गीता) की जयंती का आयोजन होता हो, वह देश धन्य है। आज गीताजंली की निर्वाण जयंती है। पांच हजार वर्ष बीत जाने पर भी भगवान श्रीकृष्ण व गीता नए और अलौकिक हैं। गीता केवल सत्संग में ही नहीं, सभी स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी को भी संस्कृति की जानकारी हो। हरियाणा सरकार ने स्कूलों में गीता का पाठ्यक्रम प्रारंभ कर संस्कृति को संजोने का काम किया है, जो बधाई के पात्र हैं।
कथा व्यास ने कहा कि जिसकी अति सुंदर वाणी हो, वह ही कृष्ण है। जब श्रीकृष्ण ब्रजभूमि में मुरली बजाते थे तो सभी ब्रजवासी भाव-विभोर होकर नाचने लगते थे और प्रकृति संगीतमय होकर गुनगुनाने लगती थी। विद्या, धन, तप, यक्ष और दक्ष में चाहे कोई कितना ही निपुण हो, तब भी वह पूर्ण नहीं होता। पूर्ण होने के लिए भगवान शिव के शरणागत हो जाओ। गरीब पिता जब बेटी की शादी कर उसे विदा करता है, तब उसकी आंखें निश्वल होती हैं।
एकबारगी जवान बेटे की मौत पर पिता पत्थर दिल हो सकता है, लेकिन बेटी की विदाई उससे सहन नहीं होती। संत प्रवर मोरारी बापू ने शुक्रवार को कथा प्रवचन के दौरान बीचबीच में गीत-गजल व शायरी के माध्यम से शिव-विवाह का प्रसंग प्रस्तुत कर समां बांध दिया। शानदार गीत-संगीत के साथ हुए शिव-विवाह प्रसंग के दौरान श्रद्धालु भाव-विभोर होकर नाचने पर विवश हो उठे।
14 वर्ष की आयु में पहली बार सुनाई कथा
मोरना। गुजरात प्रांत के जनपद भावनगर के गांव तलागाजद्रा में संत मोरारी बापू ने वर्ष 1960 में जब पहली बार श्रीराम कथा का प्रवचन किया, तब उनकी उम्र महज 14 वर्ष थी।
संत मोरारी बापू का जन्म 25 सितंबर 1946 को प्रभुदास हरयानी के परिवार में हुआ था। मां सावित्री बेन और दादा त्रिभुवन दास ने मोरारी बापू को बाल्यकाल में ही श्रीराम चरित्रमानस का पाठ कराना शुरू करा दिया था। उनकी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई, जिसके बाद जूनागढ़ के शाहपुर कॉलेज में उन्होंने आगे की पढ़ाई की। संत मोरारी बापू ने बताया कि स्कूल से आने के बाद दादा त्रिभुवन दास उन्हें रोजाना श्रीराम चरित्रमानस के पांच श्लोक याद कराते थे। उन्हीं की छत्रछाया में वर्ष 1960 में उन्होंने पहली बार श्रीराम कथा सुनाई। इसके बाद वर्ष 2009 में मोरारी बापू ने महुवा में विश्व धार्मिक सम्मेलन का आयोजन किया, जिसका शुभारंभ तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने किया था। मोरारी बापू के परिवार में तीन बेटियां भावना, प्रसन्ना व शोभना हैं, जो गृहस्थ जीवन के तहत अमेरिका, लंदन व दुबई में रहतीं हैं। वहीं, इकलौता बेटा प्रार्थी है, वह भी गृहस्थ जीवन में है।