मुजफ्फरनगर। आसमां की झील में लो चांद की नैया चली, रजत आंगन खिल रही रात रानी की कली...पहली बार 42 की उम्र पार होने के बाद सुशीला शर्मा ने यह दो लाइन लिखकर अपने अंदर छिपे कवि मन को बाहर निकाला था। उनके गीतकार भाई विजयेंद्र पाल शर्मा भी उनकी पंक्तियों को पढ़कर हैरान रह गए कि उन्होंने इस प्रतिभा को कैसे नहीं पहचाना।
अगर पहचान लिया होता तो निश्चित रूप से सुशीला शर्मा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी होती। घर परिवार की जिम्मेदारियों के बाद पिछले 30 साल से वह साहित्य को समृद्ध करने में अपना योगदान दे रही हैं।
सुशीला शर्मा शहर की वरिष्ठ साहित्यकारों में गिनी जाती हैं। उनकी गजल और गीत संग्रह साहित्य में रुचि रखने वाली महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। वह बताती हैं कि उनका जन्म दौराला में 1952 में हुआ था। उनके पिता सुक्खन लाल पाठक शुगर मिल में कार्यरत थे। हाईस्कूल की शिक्षा हो जाने के बाद मुजफ्फरनगर के बेहड़ा अस्सा गांव में उनकी शादी डॉ़ वीरेंद्र शर्मा से हुई।
सात साल तक गांव में रहने के बाद बच्चों की पढ़ाई के कारण मुजफ्फरनगर में घर बनाया। जीवन परिवार की जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ता रहा। सन् 1997 में एक दिन काव्य गोष्ठी में शामिल होने का मौका मिला। शाम को घर की छत पर बैठकर दो पंक्तियां मन में उभरी और लिखकर अपने गीतकार भाई को दिखाई तो उन्होंने शाबासी देकर आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन किया।
इसके बाद कवि सम्मेलन में काव्य पाठ का सिलसिला शुरू हुआ तो मां वाणी की कृपा से श्रोताओं ने खूब वाहवाही की। अपने लिखे को संकलित कराने के लिए रचनाओं को इकठ्ठा कर सबसे पहली पुस्तक धुंध के उस पार प्रकाशित कराई।
इसमें कविताएं, गीत और दोहों का संकलन है। हौसला और लगन बढ़ी तो चलो कोई गीत उकेरे, धूप का गजरा और गजल संग्रह गुजारिश प्रकाशित हुआ। उनका बालगीत संग्रह हम हैं रंग बिरंगे रंग प्रकाशन के लिए तैयार है। उनको सराहनीय कार्य के लिए सुवर्ण किंशुक सम्मान, गीत गंगा सम्मान समेत कई सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।