भौराकलां में स्थित प्राचीन शिव मंदिर।
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आस्था का प्रतीक है प्राचीन शिवमंदिर
भौराकलां। अटूट श्रद्धा, आस्था और विश्वास के प्रतीक प्राचीन शिव मंदिर की महिमा निराली है। सदियों पूर्व कपूरगढ़ स्थित सिद्धपीठ शिव मंदिर की स्थापना भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदाग्नि द्वारा किए जाने की मान्यता है। श्रावण मास में दूरदराज से आकर काफी संख्या में श्रद्धालु शिव मंदिर में स्थित सिद्धपीठ शिवलिंग के दिव्य दर्शन कर पुण्य लाभ कमाते हैं। खासकर सोमवार को जलाभिषेक करने वाले श्रद्धालु यहां नतमस्तक होते हैं।
शाहपुर-भौराकलां मार्ग पर स्थित हिंडन नदी के किनारे स्थित शिव मंदिर का प्राकृतिक नजारा अद्भुत है। इस मार्ग से गुजरने वाले लोग मंदिर की भव्यता और अनूठे नजारे को देखकर आकर्षित होते हैं। मान्यता है कि श्रावण मास में भगवान आशुतोष के मंदिर में जलाभिषेक करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। गांव के पूर्व प्रधान चुन्नू लाल बताते हैं कि उनके पूर्वजों के अनुसार मंदिर की स्थापना भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदाग्नि द्वारा की गई बताई जाती है। प्राचीनकाल में इस मंदिर में ऋषि आनंद बोध आश्रम द्वारा भागवत कथा का शतक पूरा किया गया था। यही वजह है सिद्धपीठ मंदिर आनंद कुटी और सप्ता कुटी के नाम से विख्यात है। मंदिर प्रांगण में कई वर्षों तक ब्रह्मलीन दंडी स्वामी सुखदेवानंद महाराज एवं परमानंद महाराज ने मंदिर में तपस्या की थी। बताते हैं कि मंदिर परिसर में दंडी स्वामी सुखदेवानंद महाराज द्वारा भगवान शिव, रामभक्त रुद्रावतार हनुमान, श्रीराम परिवार, भगवान श्रीकृष्ण, मां दुर्गा, साईं बाबा एवं भगवान परशुराम की आकर्षक मूर्तियों की स्थापना कराई थी। इस मंदिर का संचालन हरिद्वार के प्रख्यात भूमा निकेतन आश्रम द्वारा होता है। श्रद्धालु हरिप्रकाश, श्रवण कुमार और सुरेश शर्मा आदि बताते है भूमा निकेतन आश्रम हरिद्वार के ब्रह्मलीन स्वामी 1008 लक्ष्येश्वर महाराज का इस मंदिर के प्रति विशेष स्नेह रहा है। प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में स्वामी की कुटी पर निवास कर भजन कीर्तन का आयोजन करते थे। मंदिर के महंत जयराम ब्रह्मचारी बताते हैं कि चातुर्मास में दंडी स्वामी दुर्वासा आश्रम पावन कुटी पर तपस्या में लीन हैं।