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सम्पूर्ण शहर का विकास होगा अंजू के लिए चुनौती

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संपूर्ण शहर का विकास कराना चुनौती
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मुजफ्फरनगर।
कांग्रेस की नवनियुक्त पालिकाध्यक्ष अंजू अग्रवाल के लिए संपूर्ण शहर का विकास कराना एक चुनौती होगा। उनके भतीजे पंकज अग्रवाल का कार्यकाल का पॉश कालोनियों और मुख्य मार्गों तक ही सिमटा रहा। पिछड़ी बस्तियों पर उनकी नजर कम रही है। शहर की मुस्लिम और अति पिछड़ी जाति बहुल बस्तियां आज भी विकास की बाट जोह रही है। रामपुरी और किदवईनगर के हालात सबसे ज्यादा खराब हैं।
चेयरमैन अंजू अग्रवाल के लिए शहर का संपूर्ण विकास कराना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं रहेगा। एक तरफा वोट देकर मुस्लिम समाज ने उनके विकास की उम्मीद लगाई है। निवर्तमान चेयरमैन पंकज अग्रवाल के विकास का केंद्र शहर की पॉश कालोनियां और मुख्य मार्ग रहे। आम और गरीब बस्तियों तक उनके विकास का पहिया नहीं जा सका। बावजूद इसके राजनीतिक समीकरणों और शहर के माहौल को देखते हुए उनकी चाची अंजू अग्रवाल को मुस्लिम समाज ने दिल खोलकर वोट दिया। मुस्लिम बस्तियों में रहने वाले लोगों को अंजू अग्रवाल से काफी उम्मीदे हैं। शहर की उन कालोनियों में हालत सबसे ज्यादा खराब है, जिनका विकास अभी हो रहा है। मुस्लिम बहुल किदवईनगर की बात करें तो इस इलाके में न तो सड़क है और न ही सफाई है। पानी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। महमूदनगर और लद्दावाला की भी कई बस्तियों में यही स्थिति है। अति पिछड़ी जाति बहुल रामपुरी, शाहबुद्दीनपुर रोड, इंदिरा कालोनी आदि में भी विकास इंतजार कर रहा है। नगर पालिका में विकास के लिए पैसा काफी आ रहा है, लेकिन यह पैसा पैसे वालों की बस्ती में ही लगेगा या गरीबों तक भी दिखाई देगा अब यह देखना है।
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स्वच्छता अभियान आधे शहर में
मुजफ्फरनगर। नगर पालिका ने एटूजेड कंपनी के साथ मिलकर घरों से कूड़ा उठाने का अभियान चला रखा है। स्वच्छता अभियान में इसे बड़ा कदम कहा जा रहा है। इस अभियान का सबसे कमजोर पहलू यह है कि एटूजेड घरों से पचास रुपये प्रतिमाह लेती है। मुस्लिम और अति पिछड़ी बहुल बस्तियों में कूड़ा एकत्र करने का अभियान चल ही नहीं रहा है। कंपनी का कहना है कि पैसा नहीं मिलने के कारण यह स्थिति है। निवर्तमान चेयरमैन पंकज अग्रवाल का कहना है कि चेयरमैन अंजू अग्रवाल के समय में इस समस्या का निदान ढूंढा जाएगा।
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कैसे सुधरेगी सफाई व्यवस्था
मुजफ्फरनगर। शहर की सफाई व्यवस्था में मुस्लिम और अति पिछड़ी बस्तियों के साथ सौतेला व्यवहार होता है। पॉश कालोनियों में जहां एक वार्ड में 17 से बीस तक सफाई कर्मचारी हैं, वहीं इन बस्तियों में पांच से दस के बीच ही सफाईकर्मी हैं। यह भेदभाव लंबे समय से चल रहा है। भाजपा हो या कांग्रेस इस तिलिस्म को कोई नहीं तोड़ पाया है।
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