उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर दंगे पर विराम तो लगा पर वारदातें नहीं रुकीं। ‘गुरिल्ला वार’ में आधा दर्जन से ज्यादा जानें चली गईं। पहचान देखकर कत्ल होते रहे, पुलिस प्रशासन इन्हें रोकने में नाकाम साबित हुआ।
नतीजा, मोहम्मदपुर राय सिंह के जंगल में खून-खराबे के रूप में सामने आया। देखते ही देखते दोनों समुदायों में फायरिंग हुई और तीन लाशें बिछ गईं।
सात सितंबर के सांप्रदायिक दंगे के बाद भड़की हिंसा में 62 लोगों की जाने चली गई थीं। हिंसाग्रस्त गांवों के करीब 41 हजार लोग राहत शिविरों में पहुंच गए।
लिसाढ़, बहावड़ी, लांक, मुंडभर और कुटबा में घर फूंके गए। 54 दिन बीत गए, लेकिन नफरत की चिंगारी नहीं बुझी। ‘गुरिल्ला वार’ में एक के बाद एक कर 10 हत्याएं कर दी गईं। पुलिस बेबस दिखी और उन्मादी माहौल बिगाड़ने में लगे रहे।
शहर में हालात कुछ बेहतर हुए पर देहात में गुस्सा नहीं थमा। महिलाओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लगातार हत्याओं का खौफ, ऊपर से फर्जी नामजदगी का जंजाल तनाव को और बढ़ाए हुए था। पहचान देखकर कत्ल किए गए।
मेरठ के नंगला शेखू के अमित की बुढ़ाना से लौटते समय शाहपुर में हत्या कर दी गई। शामली के बनत के कपिल को गोली लगी। भौराकलां के राज सिंह, बरला के बालेश, खामपुर के नेपाल, कूकड़ा के आबिद और मुकुंदपुर के किसान बोहरम की हत्या किसने और क्यों की, यह अभी तक पुलिस पता नहीं लगा पाई है।
सभी मामलों की जांच चल रही है। एसएसपी हरिनारायण सिंह भी कह चुके हैं कि जांच में सांप्रदायिकता के बिंदू को भी देखा जा रहा है।