यूपी बोर्ड परीक्षा में मूल्यांकन का कार्य अंतिम चरण में हैं। समय से मूल्यांकन कार्य पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन मूल्यांकन समय से पूरा करने के चक्कर में उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में नियमों के साथ जमकर खिलवाड़ किया गया।
तीन से कम समय में बच्चों की साल भी की मेहनत का परिणाम लिख दिया गया। शिक्षकों ने आड़े तिरछे तरीके से कापियों को जांचा। अंकेक्षक ने भी उनकी खामियों को पकड़ा, लेकिन सुधार की गुंजाइश कम ही है।
मुरादाबाद में पांच मूल्यांकन केंद्र बनाए गए थे। जिन पर अलग अलग संख्या में कापियों भेजी गईं। कुल मिलाकर इन पांचों केंद्रों पर दस लाख से अधिक से कापियां जांची जानी हैं। इन कापियां को जांचने के लिए बोर्ड की ओर से नियुक्त किए गए परीक्षकों में से आधे से कुछ अधिक ने ही उपस्थिति दर्ज कराकर मूल्यांकन कार्य में हिस्सा लिया।
इतनी कम संख्या होेने पर केंद्र प्रभारियों ने अपनी और से भी बोर्ड का केमुआ नौ के तहत परीक्षक तैनात करते हैं। इसके बावजूद परीक्षकों की कमी बनी रहती है। किसी प्रकार से आवंटित परीक्षकों की संख्या का कुल दो तिहाई ही उपलब्ध हो पाते हैं।
ऐसे में ये सभी जल्दी जल्दी कापियां जांचते हैं। बोर्ड के नियमानुसार हाईस्कूल की पचास और इंटर की चालीस कापी एक परीक्षक जांचेगा। लेकिन वास्तविकता में शिक्षक एक दिन में 150 तक कापियाें जांच रहे हैं। कोई भी शिक्षक किसी हाल में 100 से कम उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन नहीं करता।
ऐसे में वह एक कापी के लिए अधिकतम तीन से साढ़े तीन मिनट ही दे पाता है। इस प्रकार से किसी भी प्रश्न का उत्तर पूरा नहीं पढ़ पाते। छात्र के प्रेजेंटेशन और उसकी उत्तर लिखने की शुरुआत को देखकर ही नंबर दे देते हैं। बच्चे साल भर पढ़ाई करके परीक्षा देते हैं और उन्हें बिना पूरा उत्तर पढ़े ही नंबर बांटे जा रहे हैं।