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शंकराचार्य ने गृहस्थ आश्रम को सबसे उत्तम बताया

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मुरादाबाद। रेलवे स्टेडियम में विराट धर्म सभा में श्रद्धालुओं से संवाद के दौरान गोवर्धनमठ पुरी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने गृहस्थ आश्रम को सर्वोत्तम बताया।
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आश्रमों से जुड़े एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि गृहस्थ आश्रम श्री लक्ष्मी और श्री नारायण की आराधना का वैकल्पिक स्वरूप है। इसी से सृष्टि आगे बढ़ती है। नए जीवन का सृजन होता है और सनातनी परंपरा आगे बढ़ती है। हमारी यात्रा का उद्देश्य सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सुरक्षित, संपन्न, सेवापरायण, स्वस्थ और सर्वहितप्रद व्यक्ति तथा समाज की संरचना, देश की अखंडता और सुरक्षा है।
ब्रह्मा विष्णु महेश या आदि शक्ति में किसको बड़ा मानें, यह पूछने पर उन्होंने कहा कि महाप्रलय पर सच्चिदानंद सर्वेश्वर ही रहते हैं। सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा उत्पादक के रूप में, भगवान विष्णु पालक के रूप में और भगवान शंकर संहारक के रूप में हैं। तीनों का मौलिक स्वरूप एक ही है। शक्ति और गणपति दो अतिरिक्त देव हैं।
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सरकार धार्मिक स्थलों पर सहभागिता करे, हस्तक्षेप नहीं
शंकराचार्य के मुताबिक सेक्यूलर शासन तंत्र को धार्मिक, आध्यात्मिक संस्थानों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। सरकार सहभागिता कर सकती है। भारत वर्ष में अन्य समुदायों के धार्मिक आध्यात्मिक संस्थानों पर सरकार का कोई प्रभुत्व नहीं है, लेकिन सनातनी, आर्य समाजियों के कई धार्मिक दुर्ग, मठ-मंदिरों पर अपना अधिकार बना रखा है।
कर्म के अनुरूप होता है जन्म
पूर्व कर्म के अनुरूप जन्म होता है। पूर्व जन्म में जिस प्रकार का चिंतन होता है, उसी प्रकार अगला जन्म प्राप्त होता है। जन्म और कर्म दोनों के आधार पर जाति और वर्ण व्यवस्था निर्धारित है। शिवपुराण के अनुसार कदाचित किसी का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ और क्षत्रिय विधा से जीवन यापन करता है तो वह क्षत्रिय ब्राह्मण होता है। जिस वर्ण में जन्म हुआ, उसी के अनुसार कर्म होगा तो सोने में सुगंध होगी।
देह के नाश से जीवात्मा का नाश हो जाता है, इस सिद्धांत के आधार पर पर जो पाठ्यपुस्तक बनती है, उससे व्यक्ति दिशाहीन हुए बिना नहीं रहता। धर्म, अध्यात्म और राष्ट्र के बारे में व्यक्ति को जो जानकारी चाहिए सब सुलभ हो जाए तो उसका जीवन उज्ज्वल हो जाए। इसके लिए नीति चालीसा, नीति सावित्री, नीति निधि ग्रंथों की रचना की गई है।
व्यावसायिक कागजों पर न हों देवी-देवताओं के चित्र
शंकराचार्य ने कहा कि देवी-देवताओं के चित्र व्यावसायिक कागजों पर उकेर लिए जाते हैं। इससे देवी-देवताओं का तिरस्कार होता है, जो उचित नहीं है। उन्होंने आह्वान किया कि व्यवसाय के लिए उनके नाम का प्रयोग करें और चित्रों से बचें।
किसी भी जाति-धर्म के लोग मर्यादा में मंदिरों में दर्शन कर सकते हैं
शंकराचार्य ने कहा कि किसी भी जाति व धर्म के लोग मंदिरों में देव मूर्तियों के दर्शन मर्यादा के साथ कर सकते हैं। सभी के लिए कुछ विधि निषेध होती है। यदि नियमों का पालन न किया जाए तो मूर्तियों में दैवीय तत्व के स्थान पर राक्षस तत्व आ जाएगा, जो नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा। मर्यादा के साथ अगर देव मूर्तियों का दर्शन न किया जाए तो मूर्तियों का तेज नष्ट हो जाता है। इसलिए हर आदमी को विधि निषेधों का ध्यान रखना चाहिए।
जाति संकीर्णता की नहीं, उदारता की द्योतक
शंकराचार्य ने कहा कि जाति संकीर्णता की नहीं, उदारता की द्योतक है। महाभारत के समय अर्जुन को चिंता थी कि संभावित युद्ध के बाद समाज, सनातन धर्म, जाति में विकृति न आ जाए, विलोप न हो जाए। इसी लिए पूरी गीता जाति-धर्म के संरक्षण में प्रयुक्त है। जाति के नाम पर उन्माद को दूर करना चाहिए। विक्रमादित्य, शिवाजी और राम राज्य की हम प्रशंसा करते हैं। यह सभी शासक वर्ण व्यवस्था को मानने वाले थे। भ्रांतिपूर्ण धारणा दूर करने की आवश्यकता है।
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