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Mirzapur News: जिले में थैलेसीमिया केे 14 पीड़ित

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मिर्जापुर। थैलेसीमिया की बीमारी बच्चों को माता-पिता से मिलने वाला ब्लड डिसआर्डर है। इस रोग के होने पर शरीर में हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है। जिले में 12 माह से 26 वर्ष तक के 14 थैलेसीमिया पीड़ित हैं। इन लोगों को रक्त केंद्र से मुफ्त खून प्रदान किया जाता है। इनको हर 15 दिन पर खून की जरूरत पड़ती है। मंडलीय अस्पताल के रक्त केंद्र से हर वर्ष लगभग 100 यूनिट रक्त थैलेसीमिया के मरीजों को मुफ्त दिया जाता है।
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मंडलीय अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सा डाॅ. आनंद सिंह ने बताया कि थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से आनुवंशिक तौर पर मिलने वाला ब्लड डिसऑर्डर है। इसमें शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में बाधा आती है। इसके कारण एनीमिया के लक्षण दिखाई देते हैं। इसकी पहचान छह माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में खून की कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहर से खून की आवश्यकता पड़ती है। थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है। यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थैलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया हो सकता है, जो काफी घातक हो सकता है। किंतु माता-पिता में से एक ही में माइनर थैलेसीमिया होने पर बच्चे को खतरा नहीं होता। जरूरी है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों इस संबंध में अपना टेस्ट कराएं। थैलेसीमिया की जांच के लिए हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस की जांच करानी चाहिए पर लोग शादी के पहले जांच आदि नहीं कराते। बाद में बच्चा पैदा होने पर जब छह माह बाद उसके शरीर में खून बनने की प्रकिया शुरू होती है तो बीमारी के लक्षण नजर आने लगते हैं। बच्चे को थकान, चिड़चिड़ापन, बार-बार रोना, शरीर पीला पड़ता दिखे तो इसकी जांच करानी चाहिए।
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