मेरठ जनपद की हॉट सीट बनी सिवालखास की चाबी जाट और दलित मतदाताओं के हाथ में नजर आ रही है। लगभग आमने-सामने की टक्कर में आए सपा-रालोद गठबंधन और भाजपा प्रत्याशी इन्हीं बिरादरियों के वोट को तुरुप का पत्ता मानकर चल रहे हैं। दोनों दलों के प्रत्याशी जाटों के वोट को जहां एक दूसरे से ज्यादा मिलना बता रहे हैं वहीं दलित वोटों में भी सेंध लगा अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।
इस बार का चुनाव पिछले विधानसभा चुनाव 2017 के मुकाबले बदला हुआ है। इस बार जहां सपा और रालोद एक साथ मिलकर चुनाव लड़े हैं तो वहीं भाजपा ने पिछली बार की तरह जाट और बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी पर ही दांव खेला है। सपा और रालोद के एक साथ आने से गठबंधन प्रत्याशी गुलाम मोहम्मद जहां गठबंधन की बेस वोट मुस्लिम और जाटों को अपने खाते में एकमुश्त आने की बात कहकर जीत का दावा कर रहे हैं तो भाजपा प्रत्याशी जाट और दलित वोटों में हुए ध्रवीकरण को अपनी जीत का आधार मान रहे हैं।
2017 में दबथुवा में भाजपा, छुर में जीता था रालोद
2017 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डाले तो जाट बाहुल्य गांव दबथुआ में भाजपा प्रत्याशी को रालोद प्रत्याशी से 48 वोट ज्यादा मिले थे। इसी गांव में बसपा प्रत्याशी को भी 664 वोट हासिल हुए थे। सरूरपुर खुर्द गांव में रालोद को 1664, भाजपा को 543 और बसपा को 730 वोट मिले थे। रालोद समर्थक माने जाने वाले छुर गांव में रालोद को 3162, भाजपा को 758 और बसपा को 148 वोट मिले थे। नेक गांव में रालोद को 846, भाजपा को 437 और बसपा को 591 वोट मिले थे। मुस्ल्मि बाहुल्य गांव रसूलपुर धौलड़ी में भी भाजपा 653 और बसपा 837 वोट झटकने में कामयाब हुई थी। क्षेत्र के राजनीतिक पंडितों के अनुसार सीट पर मुस्लिमों का ज्यादा रुझान गठबंधन प्रत्याशी की तरफ देखा गया है। मुस्लिम वोटों के बाद दूसरे और तीसरे नंबर की बड़ी बिरादरी जाट और दलितों में बिखराव नजर आया है। इन वोटों के बिखराव की बारिश जिधर भी होगी उसकी राजनीतिक जमीन को उर्वर कर देगी।
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11421 वोटों का रहा था हार-जीत का अंतर
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर लड़े गुलाम मोहम्मद और चुनाव जीते भाजपा के जितेंद्र सतवाई के बीच हार-जीत का अंतर 11421 वोटों का रहा था। जितेंद्र सतवाई को 72842 और गुलाम मोहम्मद को 61421 वोट मिले थे। रालोद के यशवीर सिंह 44710 लेकर तीसरे और बसपा के नदीम चौहान 42524 मत लेकर चौथे स्थान पर रहे थे। सपा-रालोद समर्थक दोनों पार्टियों का गठबंधन होने और दलितों के वोट में सेंधमारी से जीत का दावा कर रहे हैं। जबकि भाजपा समर्थक पार्टी के बेस वोटों के साथ ही जाटों और दलितों की वोट बड़ी संख्या में मिलने से जीत का दावा कर रहे हैं।
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