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सहारनपुर: आतिया साबरी के दर्द की पूरी कहानी... कभी टूटी नहीं, लड़ती रही और नतीजा 'जीत'

Wed, 31 Jul 2019 03:31 AM IST
कपिल kapil आनंद प्रकाश, अमर उजाला, सहारनपुर
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आतिया साबरी - फोटो : अमर उजाला
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जब मुझे तीन तलाक दिया गया, तो मेरे सामने दो रास्ते थे, एक था लड़ाई का और दूसरा था चुप बैठ जाने का। दो मासूम बेटियों का चेहरा सामने था, जिनके पैदा होने पर मुझे तलाक दिया गया। मैंने दोनों बेटियों की खातिर मन में ठान लिया कि तीन तलाक के खिलाफ लड़ाई लडू़ंगी, चुप नहीं बैठूंगी। इस लड़ाई में अड़चनें भी आईं, लेकिन मैं कभी टूटी नहीं, बल्कि साहस के साथ लड़ती रही। मेरे परिवार ने इस लड़ाई में मेरा पूरा साथ दिया। 

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यह कहना है कि तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ने वाली सहारनपुर के मोहल्ला आली की चुंगी निवासी आतिया साबरी का। आतिया ने बताया कि 25 मार्च 2012 को उनकी शादी हरिद्वार जनपद के सुल्तानपुर निवासी सपा नेता वाजिद अली के साथ हुई थी। इसके बाद उन्होंने दो बेटियों को जन्म दिया, जिसके बाद 2014 में पति और ससुरालियों ने मारपीट करके घर से निकाल दिया था। डेढ़ साल तक वह मायके वालों के पास रही, लेकिन दो नवंबर 2015 को पति ने लिखकर तीन तलाक दिया, तो लगा कि अब जिंदगी में बचा ही क्या है। क्योंकि उन्हें इसलिए तलाक दिया गया था कि दो बेटियां पैदा हो गई थीं। 

आतिया ने बताया कि दोनों बेटियों को देखकर औरत के अंदर की ताकत जागी, खुद ही लड़ाई लड़ने की ठानी। यदि तब मैं सोच लेती कि मुस्लिम औरत हूं, लड़ाई नहीं लड़ सकती, तो ऐसा कभी न होता। जब हमारा निकाह नियम से हुआ, तो तलाक बगैर नियम कैसे दे दिया गया। कानून बनवाना हमारा मकसद था। कानून बन जाने पर महिलाओं से अपील है, जो इस दौर से गुजर रही हैं वह आवाज उठाएं।

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आतिया साबरी को मिठाई खिलाते परिजन - फोटो : अमर उजाला
आतिया कहती हैं कि तीन साल के संघर्ष के दौर में जीत के प्रति आश्वस्त थीं। मेरे मन में विश्वास था और ऊपर वाले पर भरोसा था। दो बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी थी। नसीब ऊपर वाला बनाता है, लेकिन जिंदगी की राह खुद तय करनी होती है। कोने में बैठकर रोने से कुछ हासिल नहीं होता। जीवन में हादसे होते हैं, पर उनसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि लड़ना चाहिए। मैं भी टूटी नहीं, बल्कि बेटियों के चेहरे की मुस्कान से मुझे ताकत मिलती रही और लड़ाई लड़ती रही। 

परिवार का मिला पूरा सहयोग 
आतिया साबरी ऊर्दू और समाजशास्त्र से एमए हैं। वह कहती हैं कि बेटियों का शिक्षित होना जरूरी, ताकि जागरूक होकर अपने अधिकार पा सकें। वह अपनी एक बेटी को डॉक्टर और दूसरी को सिविल सर्विस में ले जाना चाहती हैं। आतिया ने बताया कि तीन भाइयों में सबसे छोटी हूं। उनके पिता मजहर हसन, भाई मोहम्मद इकबाल डॉक्टर हैं, तो दूसरे भाई रिजवान एनजीओ चलाते हैं और तीसरे भाई अफजाल जल निगम डाक पत्थर में अधिशासी अभियंता हैं। आतिया कहती हैं कि इस लड़ाई में परिवार ने पूरा सहयोग किया, कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।

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