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खून चढ़ाने तक सीमित हीमोफीलिया का उपचार

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संवाद न्यूज एजेंसी
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मुजफ्फरनगर। जिला अस्पताल में हीमाफीलिया के मरीजों के उपचार की कोई खास व्यवस्था नहीं है। ओपीडी में नए मरीज आते हैं तो उन्हें रैफर कर दिया जाता है। चिकित्सक के मुताबिक इस बीमारी में उपचार के लिए ब्लड फैक्टर फ्यूजन जांच कराने की आवश्यकता होती है। जिला अस्पताल में यह सुविधा न होने के कारण किसी भी मरीज का उपचार नहीं हो पाता। बाहर से जांच कराकर आने वाले मरीजों को ही प्रतिमाह खून चढ़ाया जाता है।

लोगों में आनुवांशिक रक्तस्राव की बीमारी को हीमोफीलिया कहा जाता है। जिसमें खून का थक्का बनने की क्षमता कम हो जाती है। यह बीमारी अधिकतर पुरुषों को ही प्रभावित करती है। इससे पीड़ित लोगों को शरीर में रक्तस्राव की समस्या रहती है। इस बीमारी का प्रमुख कारण शरीर में रक्त का थक्का बनाने वाले कारकों का कम हो जाना होता है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. योगेंद्र त्रिखा के मुताबिक शरीर में खून का थक्का न जमने के 13 कारक अथवा फैक्टर होते हैं। जिनमें आठवां फैक्टर प्रमुख माना जाता है। ब्लड फैक्टर फ्यूजन की जांच कर पता लगाया जाता है कि हीमोफीलिया का कौन सा कारक है।
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डॉ. योगेंदद्र त्रिखा ने बताया कि खास सावधानियां बरत कर और हीमोफीलिया प्रतिरोधक फैक्टर के जरिये इस बीमारी को नियंत्रित किया जाता है। इस बीमारी में आंत या दिमाग के हिस्से में होने वाले रक्तस्राव से जान भी जा सकती है। जोड़ों में सूजन के साथ जब इस बीमारी में अक्सर दर्द होता है तो यह आंतरिक रक्तस्राव के कारण होता है, जो आगे चल कर दिव्यांगता में परिवर्तित हो सकता है। यह बीमारी दो प्रकार की होती है। जिन लोगों में रक्त का थक्का जमाने वाले फैक्टर आठ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया ए होता है और जिनमें फैक्टर नौ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया बी होता है। उन्होंने बताया कि हीमोफीलिया पीड़ित मरीज के शरीर में प्रति माह खून चढ़ाया जाता है।
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