उनको किसी साधू ने राख दी और कहा कि इस राख को भगत सिंह के चारों ओर बिखेर देना, इससे उनकी फांसी टल जाएगी। जब मां विद्यावती ऐसा करने के लिए जेल में भगत सिंह के पास पहुंची तो उन्होंने मां की मुट्ठी देख ली और पूछा कि मां हाथ में क्या है। तब मां ने साधू द्वारा कही गई पूरी बात उनके सामने रखी।
इस पर भगत सिंह ने कहा कि इस राख को उनके छोटे भाई और परिवार की रक्षा के लिए इस्तेमाल करना। क्योंकि मैं अपना जीवन पहले ही देश के लिए समर्पित कर चुका हूं। किरणजीत सिंह बताते हैं कि भगत सिंह के पिता अर्जुन सिंह ने घोषणा की थी कि वह अपने बेटों को देश की आजादी को समर्पित करते हैं। वही बात भगत सिंह के मन में अंतिम समय तक रही। इसीलिए वह हंसते हंसते-फांसी चढ़ गए।
जस्टिस आगा हैदर ने दिया था इस्तीफा
भगत सिंह के केस की सुनवाई के लिए लाहौर में तीन जजों की पीठ बनाई गई थी। इनमें से एक जस्टिस आगा हैदर थे, जो सहारनपुर के थे। उनका परिवार आज भी सहारनपुर में रहता है। जस्टिस आगा हैदर भगत सिंह को फांसी दिए जाने के पक्ष में नहीं थे। वह साफ मना कर चुके थे। अंग्रेज सरकार के दबाव को देखते हुए उन्होंने भगत सिंह को फांसी देने की बजाय इस्तीफा दे दिया।
भगत सिंह को रसगुल्ले पसंद थे
किरणजीत सिंह ने बताया कि भगत सिंह को मीठा बहुत पसंद था, उसमें भी रसगुल्ले। जब लाहौर में उन पर मुकदमा चल रहा था तो तारीख के दौरान छोटे भाई कुलतार सिंह भी पिता अर्जुन सिंह के साथ अदालत पहुंचे थे। उन्होंने भगत सिंह को बताया कि वह अपनी कक्षा में पास हो गए हैं तो भगत सिंह नाराज हुए। उन्होंने कहा कि यदि पास हुए हो तो मिठाई कहां है। इसके बाद अगली तारीख पर कुलतार सिंह रसगुल्लों का डिब्बा लेकर पहुंचे।