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संघर्ष में सपनों की आशा जिंदगी की खुशी है मां: पति को खोया, मुश्किलों से लड़कर हौसले से बच्चों को आगे बढ़ाया

Sun, 12 May 2024 10:58 AM IST
Dimple Sirohi मुस्कान कटारिया, मेरठ

सार

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Mothers Day 2024 - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मां खुशी है। जिंदगी है। हौसला है। मां संघर्ष में सपनों की उम्मीद है। मां ही वह योद्धा है जो अपनी संतान के सुख के लिए किसी भी तरह के हालातों से लड़ सकती है। उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचाने का रास्ता दिखाती है। कुदरत का करिश्मा है माता। मां जैसा कोई नहीं। इसलिए मां ही सबसे प्यारी और न्यारी है। कुछ ऐसी ही भावनाओं के साथ सभी बेटे-बेटियों ने शनिवार को मदर्स डे पर अपनी माताओं को याद किया। साथ ही उन पलों को याद किया जब मां के प्यार ने ही विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने का हौसला दिया और सफलता की राह दिखाई।

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पति नहीं रहे तो बेटे-बेटी का सहारा बनीं
सर छोटूराम इंजीनियरिंग कॉलेज में कार्यरत बलवंत नगर निवासी डॉ. रानू अग्रवाल असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। कोरोना काल के दौरान हार्टअटैक से पति डॉ. सोहन गर्ग का निधन हो गया था। पति को खोया, मगर उन्होंने हौसला नहीं खोया। खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। बच्चों के लिए मां के साथ पिता भी बनीं। उन्हें पढ़ा रही हैं, जिंदगी की सीख दे रही हैं। डॉ. रेनू बताती हैं कि पति का साथ छूटा तो लगा कि सब कुछ खत्म हो गया। बाद में खुद को संभाला और फिर बच्चों को। अब मैं ही उनकी मां हूं और मैं ही पिता भी। बड़ी बेटी सारांशी गर्ग नौवीं कक्षा की छात्रा है। बेटा अर्णव गर्ग कक्षा सात में पढ़ रहा है। बिना पति के बच्चों को पालना में संघर्ष और बढ़ जाता है, लेकिन शायद कुदरत हौसला और हिम्मत भी और बढ़ा देती है। अब यही सपना है कि बेटे-बेटियों को कामयाब इंसान बना सकूं।

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बच्चों का हौसला बढ़ाया, अब यूएस में कर रहे पढ़ाई
पांडव नगर निवासी सरिता चौहान घरेलू महिला हैं। पति सुमित चौहान की लीवर खराब होने से साल 2020 में मौत हो गई थी। पति का होटल का व्यवसाय है। उसे भी वह देखती हैं। पति की मृत्यु के समय बड़ा बेटा यश 12वीं, उससे छोटा बेटा प्रयक्ष 10वीं में थे।

सरिता बताती हैं कि ऐसे हालात में बच्चों को संभालना आसान नहीं था। पति के बिना जिंदगी मुश्किल हो जाती है। पहले खुद को संभाला और बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए काफी संघर्ष किया। अकेले बच्चों की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है। अब यश और प्रयक्ष यूएस में स्नातक कर रहे हैं।

सबसे छोटे बेटे देवर्ष ने इस वर्ष सीबीएसई बोर्ड से दसवीं की परीक्षा दी है। इस कठिन समय में ससुर डॉ. बीबी चौहान ने काफी मदद की। मां के रूप में बच्चों को सफल देखना ही उनका सपना है। उम्मीद है कि वह इससें सफल होंगी।

दुकान बेची, जॉब कर बच्चों को पढ़ाकर सफल बनाया
शास्त्रीनगर के कुटी रोड निवासी अंजु शर्मा का संघर्ष हिम्मत देने वाला है। साल 2012 में ब्रेन हेमरेज से पति अरविंद शर्मा का निधन हो गया था। उनकी कपड़ों की दुकान थी। उनकी मौत के बाद दुकान बंद हो गई है। बच्चों की पढ़ाई और परवरिश के लिए दुकान बेचनी पड़ी। इसके बाद नौकरी करनी पड़ी।

अंजु शर्मा बताती हैं कि उन पर घर और बच्चों की जिम्मेदारी आ गई। खुद को मानसिक रूप से मजबूत करने में काफी समय लगा। 10 साल से ब्यूटी पार्लर में काम किया। बच्चों के लिए माता-पिता दोनों की जिम्मेदारियां संभाली हुई है। वह बताती हैं कि इतना लंबा संघर्ष किया है, मगर कभी खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। मुझे खुशी है कि मेरा संघर्ष व्यर्थ नहीं गया। आज मेरी दो बेटियां गुरुग्राम में योग सिखाती हैं। मेरा बेटा 12वीं कक्षा में पढ़ रहा है। बच्चों की खुशी में ही मेरी खुशी है।
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गंभीर बीमारी से ग्रस्त बेटों के लिए मरहम है मां
बलवंत नगर निवासी जुड़वा भाई आयुष गोयल-पीयूष गोयल जन्म से ही सेरेब्रल पाल्सी नामक रोग से ग्रस्त होने के कारण 60 प्रतिशत दिव्यांग हैं। दोनों ठीक से चल भी नहीं पाते हैं। इसके लिए दोनों भाइयों को रोजमर्रा के कार्य में मां की सहायता की आवश्यकता होती है।

मां सुधा उनके लिए जख्म पर मरहम की तरह हैं। उनकी मदद से ही दोनों भाई एमए, बीएड हैं। दोनों भाई कहते हैं मुश्किल वक्त में जब किसी ने साथ नहीं दिया, उस वक्त भी उनकी मां ढाल बनकर खड़ी रहीं। अब मां के आशीर्वाद से समाजसेवा में अच्छा मुकाम पाया है। वे राज्यस्तरीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। वे कहते हैं कि मां ही सब कुछ अकेले झेल लेती है। मां से बढ़कर कोई नहीं। मां सुधा कहती हैं कि उनके बेटे उनके लिए अभिमान हैं। उनके लिए सबकुछ हैं।
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