मेरठ में तेंदुए को पिंजर में बंद कर ले जाते हुए।
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तेंदुए को पकड़ने के लिए वैसे तो 51 घंटे तक अभियान चला, लेकिन जिसमें सफलता मिली वह आखिरी घंटे सबसे ज्यादा कीमती रहे। दिमाग और हिम्मत का इस्तेमाल कर उत्तेजित तेंदुए को बेहोश किया गया। कानपुर चिड़ियाघर से आए वेटनरी डॉक्टर जो डार्ट (गन से शॉट मारना) का काम कर रहे थे, उन्हें तेंदुए ने घायल कर दिया। एक बार को तो हिम्मत जवाब देने को हुई। एक डार्ट तेंदुए को लगी, लेकिन उसका असर नहीं आया। तब डोज बढ़ाने के बाद वह बेहोश किया गया।
तेंदुए को जितना आंका जा रहा था, वह उससे ज्यादा आक्रामक और शक्तिशाली निकला। यही वजह थी कि मंगलवार रात मिलिट्री हॉस्पिटल में तेंदुए को जब ट्रैंकुलाइज किया गया तो उसका असर नहीं हुआ और वह गायब हो गया। बृहस्पतिवार सुबह कानपुर चिड़ियाघर से तीन सदस्यीय टीम पहुंची। वह अपने साथ एक ट्रैंकुलाइज गन भी लाई थी। टीम को वेटनरी डॉक्टर आरके सिंह लीड कर रहे थे। दो टीम मेस गोदाम में दाखिल हुई। तेंदुए को बरामदे में एक जगह संकुचित कर दिया गया। दो शॉट मारे गए, लेकिन वह मिस हो गए।
इस बीच तेंदुए ने डॉ. आरके सिंह जो हाथ में गन लिए थे, उन पर हमला कर दिया। दरअसल तेंदुआ गन पर झपटा था। हाथ में पंजा लगने से वह घायल हो गए। इसके बाद टीम ने तय किया कि डोज बढ़ानी होगी। डेढ़ गुना की जगह डोज तीन गुणा की। फिर शॉट शोल्डर पर किया। लगते ही तेंदुआ पलक झपक गया और कुछ ही सेकेंड पर गर्दन जमीन पर झुक गई।
पूर्व डीएफओ और वन्य जीव एक्सपर्ट जीएस खुशारिया ने सबसे पहले तेंदुए पर हाथ रखा। उसे ऊपर से पकड़कर अपनी ओर खींचा। फिर स्टाफ ने उसे बाहर निकाला। कानपुर चिड़ियाघर से आई टीम में हेल्पर जितेश और एनिमल कीपर विनोद शामिल रहे।