नेताओं के ज्वलंत और तथ्यपरक भाषणों से किसानों में सत्ता परिवर्तन की आग दिखाई दी। बागपत के अंछाड़ निवासी किसान वीरेंद्र तोमर और मेरठ के छिलौरा गांव निवासी इंदर ने कहा कि मोदी सरकार के एजेंडे में किसान नहीं पूंजीपति दोस्त है। किसानों से बना पूछे ही कोरोना काल में तीन कृषि कानून लाए गए और भारी विरोध के बाद बिना सदन में बहस कराए पास करा लिए गए। जब किसानों ने ये कानून मांगे ही नहीं तो उन्हें जबर्दस्ती क्यों दे रहे हैं।
मुजफ्फरनगर के कबीरपुर गांव निवासी उज्जवल बालियान ने बताया कि पिछले नौ महीने से किसान बॉर्डर पर बैठे हुए हैं। सैकड़ों किसानों की जान चली गई है, लेकिन पीएम ने शोक तक प्रकट नहीं किया है। भाजपा नेता उल्टा किसानों को माओवादी, खालिस्तानी, आंदोलनजीवी करके बेइज्जत कर रहे हैं। किसान वोट की चोट से सरकार को सबक सिखाएंगे।
मोर्चा नेताओं ने सुनाई खरी खोटी
संयुक्त किसान मोर्चा नेताओं ने तीन कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान से लेकर खेती पर आने वाले संकट के बारे में किसानों को न केवल सचेत किया बल्कि सत्ता परिवर्तन के लिए वोट की चोट देने की हामी भी भरवाई। शिवकुमार क्क्का, डॉ. दर्शनपाल, बलबीर सिंह राजोवाल, अभिमन्यू कौहाड़, मेधा पाटकर, योगेंद्र यादव से लेकर चौधरी राकेश टिकैत आदि सभी नेताओं ने आंदोलन को फसल और नस्ल बचाने का आंदोलन बताया। कहा कि ये आजादी की दूसरी लड़ाई है जो अपनों से लड़नी पड़ रही है। किसानों ने अंग्रेजों से भी जंग जीती थी अब मोदी-योगी से भी जंग जीतेंगे।
उमड़ा किसानों का जनसैलाब
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एतिहासिक रही किसान महापंचायत, मगर वोट क्लब का नहीं तोड़ सकी रिकॉर्ड
मुजफ्फरनगर के जीआईसी मैदान में हुई किसान-मजदूर महापंचायत भारी भीड़ की दृष्टि से तो एतिहासिक बन गई, लेकिन सन् 1979 में दिल्ली के वोट क्लब पर हुई चौधरी चरण सिंह की किसान महापंचायत जितनी भीड़ नहीं पहुंची। उस रैली के गवाह रहे बुजुर्गों ने बताया कि वोट क्लब की महापंचायत का रिकार्ड अभी तक नहीं टूट सका है। हालांकि मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में जुटी भारी भीड़ ने किसानों के अंदर जोश और उत्साह भर दिया है। वहीं सरकार को भी संदेश देने में कामयाब रही है।
गांव चिंदौड़ी के किसान चौधरी बलवान सिंह और पाथौली निवासी ब्रजपाल सिंह सांगवान ने बताया कि उन्होंने वोट क्लब की चौधरी चरण सिंह वाली महापंचायत भी देखी थी और इस महापंचायत का भी हिस्सा बने हैं। भीड़ की दृष्टि से इसमें वोट क्लब जितनी तो भीड़ नहीं आई लेकिन महापंचायत अपना उद्देश्य साधने और सरकार को संदेश देने में सफल हो गई। पिछले नौ महीने से बॉर्डर पर बैठे किसानों और किसान आंदोलन में महापंचायत ने नई जान फूंकने का काम किया है।