महिला सशक्तिकरण की मिसाल है यह व्रत
एडवोकेट रुचि रस्तौगी कहती है नौकरीपेशा होने के बावजूद घर में हम एक गृहिणी हैं और बाहर हम एक कामकाजी महिला हैं। बाहर की चुनौतियों से भी लड़ना है और फिर घर आकर परिवार की जिम्मेदारियों का भी निभाना है। ऐसे में पति घर और बाहर हर जगह सपोर्ट करते हैं। आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करतें हैं और एक विश्वास के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़े रहते हैं। ये नारी शक्ति नहीं तो और क्या है। वहीं पत्नियां भूखी-प्यासी रहकर पति की लंबी उम्र, उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं और महिलाएं हक से इस उल्लास को मनाने के साथ साथ पति से मनपसंद चीजों की मांग भी करती हैं।
जिम्मेदारियों और रिश्तेदारियों को निभाने का है पर्व
एडवोकेट रेखा और एडवोकेट रुचि का कहना है कि सुहागिनों को करवाचौथ पर भारतीय परंपरा के अनुसार कोथली भेजी जाती है। बायना बांटा जाता है, ऐसे में रिश्तों को एक साथ जोड़ने में भी अहं भूमिका निभाता है। कामकाजी महिलाओं की बात करें तो उनके लिए यह एक ऐसा दिन है, जो आपको खास तौर पर सास-ननद को साथ लेकर शॉपिंग करने, साथ व्रत खोलने तक एक अलग अनुभव देता है और पारिवारिक रिश्तों को मजबूती देता है।
पत्नियां करवा चौथ के दिन ज्यादा डिमांडिंग हो जाती हैं, पति के रूप में आप इसे कैसे देखते हैं?
पूर्व सैनिक सुशील कुमार कहते हैं कि यह बिल्कुल सही है पत्नियां करवा चौथ के दिन डिमांडिंग हो जाती है, इस दिन उन्हें मनपसंद गिफ्ट लेने के साथ साथ अपनी सेवा कराने का भी भरपूर मौका मिलता है। पत्नी अगर मेहंदी लगवा रही है, तो पति चाय-कॉफी बनाकर लाते हैं। बच्चों को संभालते हैं, घर के काम में हाथ बंटाते हैं। पत्नी को शॉपिंग कराते हैं। पायल-चूड़ी, साड़ी, गहने सब खरीदवाते हैं, घुमाने ले जाते हैं। हां, करवा चौथ का व्रत कहीं न कहीं पति-पत्नी के बीच प्रगाढ़ता को बढ़ाता है। उन्हें अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाने के प्रति भी प्रेरित करता है।
बदलाव का उदाहरण है करवा चौथ का व्रत
सुशील कुमार कहते हैं कि करवा चौथ को आप एक बदलवा के नजरिए से भी देख सकते हैं। पति-पत्नी के रूप में एक दूसरे की भावनाओं के सम्मान करने की भावना, एक दूसरे को कम ज्यादा आंकने की भावना से ऊपर उठकर सोचने की स्वतंत्रता देता है। पहले सिर्फ पत्नियां करवा चौथ का व्रत रखती थीं, लेकिन अब पति भी पूरा दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए व्रत रखते हैं। जाहिर है कि ये एक बदलाव ही है।
परंपराओं के अनुरूप सजने संवरने का मौका देता है करवा चौथ का व्रत
दिन प्रतिदिन नारी एक साधारण तरीके से जीवन जी रही होती है, और करवाचौथ का व्रत उसी बिजी शेड्यूल से महिलाओं को निकालकर परिवारों के साथ एक खुशनुमा माहौल में वक्त बिताने का, त्योहारों के उल्लास को जीने का मौका देता है। प्रतिदिन केजुअल्स में ऑफिस जा रही महिलाएं इस दिन के लिए बेसब्री से उत्सुक रहती हैं, क्योंकि ये त्योहार ही उनके सजने संवरने का, सोलह श्रृंगार करने का मौका होता है। चाहे गहनें हों या कोई अन्य सामान हो पति से अपनी पसंदीदा चीजों की डिमांड रखने का मौका होता है।
सोशल मीडिया ने दोगुना किया त्योहारों का आनंद
आज कोई भी आयोजन सोशल मीडिया की मौजूदगी के बिना अधूरा है। नई ड्रेस पहनने से लेकर त्योहार के सेलिब्रेशन तक हर पल का अपडेट हम सोशल मीडिया के जरिए अपने दोस्तों रिश्तेदारों तक पहुंचा देते हैं। करवा चौथ की बात करें, तो इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने त्योहारों के आनंद को दोगुना करने में अहं भूमिका निभाई है। एडवोकेट रेखा कहती हैं कि एक सैनिक देश की रक्षा के लिए बंदूक लिए घर से मीलों दूर सीमा पर डटा रहता है तो पत्नी सैनिक पति की रक्षा के लिए घर पर निर्जला व्रत रखती है। ऐसे में सैकड़ों मील की दूरी होने के वाबजूद वे इंटरनेट के जरिए एक कॉल या वीडियो कॉल से अपना व्रत एकसाथ खोल सकते हैं। यही नहीं सोशल मीडिया ने त्योहारों को मनाने की जानकारी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई है।
कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। इस व्रत को लेकर पतिव्रताएं बेहद उत्साहित रहती हैं। इस व्रत में सुहागिन महिलाएं चांद को अर्घ्य देकर और छलनी से पति का चेहरा देखकर व्रत खोलती हैं। चंद्रमा को देखने से पहले छलनी में दीपक रखती है, फिर चांद का दीदार करती हैं और फिर पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद पति अपनी पत्नी को अपने हाथ से पानी पिलाकर मिठाई खिलाते हैं तब यह व्रत पूरा होता है।