तोमर ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के 2500 किलोमीटर के सफर में काली नदी सर्वाधिक रासायनिक प्रदूषण बांट रही है। हिंडन नदी व नालों का केमिकल, रासायनिक, युक्त जहरीला पानी यमुना में बहा रही है।
यमुना का जल भी उपयोग के लायक नहीं
यमुना का जल किसी भी उपयोग लायक नहीं है। इतना ही नहीं, हैंडपंप का पानी भी पीने लायक नहीं रह गया है, क्योंकि स्लाटर हाउस एवं अन्य औद्योगिक इकाइयां प्रदूषित पानी जमीन के अंदर भी डालते रहते हैं। इसके कारण अंडरग्राउंड पानी प्रदूषित हो गया है।
प्रदूषित पानी के कारण कैंसर, पीलिया, पेचिस, गैस्ट्रोएन्टराइटिस, यकृत, हैजा, क्षय रोग, खुजली, नेत्र रोग व पेट की विभिन्न प्रकार की बीमारियां बढ़ रही हैं। तोमर ने सभापति महोदय के माध्यम से कहा कि केंद्र सरकार से अनुरोध करूंगा कि एनसीआर के जन स्वास्थ्य को देखते हुए इन औद्योगिक इकाइयों पर कठोर कार्रवाई की जाए।
दर्जनों गांवों में मरीजों की भरमार
तीन दशक पहले काली नदी का पानी निर्मल था। अब इसके किनारे के गांवों में तेजी से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां बढ़ रही हैं। नदी को साफ करने व जल शुद्ध करने की तमाम कवायद हुई, लेकिन योजना परवान नहीं चढ़ पाई। प्रमुख संस्थाओं ने भी स्वच्छ जल को लेकर अभियान चलाया, लेकिन प्रयास कुछ दिन में ही दम तोड़ गया।
खतौली के अंतवाडा गांव से निकली काली नदी के किनारे पहले काफी पेड़ थे। इनके फलों से सिंचाई विभाग की आमदनी होती थी। परंतु, औद्योगिक इकाइयों के दूषित पानी के कारण नदी का अस्तित्व ही खत्म होता चला गया। नंगली, देदवा, अझौता, पनवाडी, सैनी, गोकलपुर, जलालपुर, उल्खेपुर, बहचौला समेत दर्जनों गांवों में अब तक कैंसर से सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है।
काली नदी संघर्ष समिति के सदस्य पुरुषोत्तम उपाध्याय, अजयवीर, गुलचंद ने बताया कि केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान से भी नदी में साफ पानी छोड़ने की मांग कर चुके हैं, लेकिन अभी तक इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। यदि सरकार एक माइनर खोदकर उसे काली नदी में मिला दे तो भारी बारिश होने के बाद इस माइनर में भी कुछ पानी छोड़ा जा सकता है, जिस कारण नदी को दोबारा जीवन मिल सकता है।