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#हिंदीहैंहम: हिंदी के ‘आभूषण’ बने गीत कवि भारत भूषण, बनफूल में रचा मानव मन का दर्द

Sun, 23 Aug 2020 05:03 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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गीतकवि भारत भूषण - फोटो : अमर उजाला
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 मेरठ। हिंदी के प्रवाह में जनमानस को सराबोर करने वाला एक गीत कवि, जिसे साहित्य जगत ने हिंदी के आभूषण की उपाधि से नवाजा। मेरठ में 8 जुलाई 1929 को जन्मे गीतकवि भारत भूषण शृंगार श्रेेणी के मुख्य गीत कवि थे। शिक्षण और साहित्य की दो धाराओं पर भारत भूषण हिंदी के प्रसार की नाव खेते चले जाते थे।
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हिंदी साहित्य काव्य पक्ष में सुकुमार गीत कवि नाम से मशहूर स्व. भारत भूषण के शब्दों से शृंगार की रस धारा अविरल बहती थी।श्रृंगार के संयोग, वियोग दोनों पक्ष उनकी रचनाओं का अहम आधार थे। कवि भारत भूषण शिक्षण के साथ साहित्य में रमते चले गए। ‘सागर के सीप’ इनका प्रमुख गीत संग्रह है। राम की जलसमाधि इनकी बहुचर्चित कविता है।

भारत भूषण ने तीन काव्य संग्रह सागर के सीप, ये असंगति वर्ष व मेरे चुनिंदा गीत लिखा। ये असंगति जिंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई, चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं हूं बनफूल आदि इनके प्रमुख प्रतिनिधि गीत हैं। 17 दिसंबर 2011 को इन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। अब इनके परिवार में पत्नी शारदा देवी, पुत्र कुमार पाटल व अन्य सदस्य हैं।

मंचों से बहती गीत रसधार
कवि सम्मेलनों में भारत भूषण के गीतों की रसधार अविरल प्रवाहित होती है। महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर जैसे अमोल साहित्य के धुरंधरों के साथ इन्होंने मंच साझा किए। राम की जलसमाधि उनका गीत गीतिकाव्य में मील का पत्थर है। जिसे सुनकर महादेवी वर्मा कहती थीं कि आपने राम पर लगे सभी आक्षेेपों को धो दिया।

पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा- हारा रीता-रीता,
नि:शब्द धरा,
नि:शब्द व्योमनि शब्द अधर पर
रोम-रोम था टेर
रहा सीता-सीता। (उनकी कविता राम की जलसमाधि के अंश)

बनफूल में रचा मानव मन का दर्द
भारत भूषण शृंगार के संयोग, वियोग दोनों पक्षों के महारथी थे। अपने गीत बन फूल में भारत भूषण ने मानव के दर्द को दिखाया। मैं हूं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना मैं भी उनमें ही हूं जिनका, जैसा आना वैसा जानासिर पर अंबर की छत नीली, जिसकी सीमा का अंत नहीं मैं जहां उगा हूं वहां कभी भूले से खिला बसंत नहीं।
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जूही-पुत्री, शारदा देवी, भारत भूषण की पत्नी  - फोटो : अमर उजाला
जनजन तक पहुंचाई हिंदी 
काव्य यात्रा के इस पथिक ने हिंदी को जनजन तक पहुंचाने के लिए खूब प्रयोग किए। काव्य की वाचिक परंपरा को पुनर्जीवित किया। उनका गीत सोमनाथ उनका श्रेष्ठ सृजन माना जाता है। मैं रात-रात भर दहूं और तू काजल आजं-आजं सोए, मुझको क्या फिर शबनम रोए, मैं रोऊं या सरगम रोए काफी पसंद किया जाता है। 

आज भी भावविभोर होती हूं
मेरे पिता हिंदी साहित्य के सम्राट थे। उनके लेखन के समकक्ष किसी का लेखन आज तक प्रतीत नहीं हुआ। शृंगार रस पर लिखी उनकी रचनाएं मील का पत्थर है। राम की जलसमाधि आज भी सुनती हूं तो भावभिवल हो जाती हूं। - जूही, पुत्री भारत भूषण सदर

हिंदी उनका जीवन थी
हिंदी उनका जीवन थी। एक दिन में वह 12 घंटे पढ़ते थे। हिंदी ने उन्हें ऐसा मोहित किया था कि अपनी भी सुध नहीं रहती थी। अपनी अमर रचनाओं में आज भी वो हमारे बीच हैं। दिग्गज साहित्यकार भी उनका बहुत मान करते थे। - शारदा देवी, भारत भूषण की पत्नी 
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