खांटी अंदाज में बात करने वाले चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को किसान अपनी अपनी आवाज मानता था, उनमें अपना अक्श देखता था। धरना, घेराव, जाम और डेरा डाल देना, उनके आंदोलन के हथियार थे। हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के साथ दक्षिण भारतीय राज्यों का भी साथ मिलता था। भाकियू ने 25 से 28 अक्तूबर 1988 तक वोट क्लब पर किसान महापंचायत की, पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।
इसमें उस समय के कर्नाटक के किसान नेता नजूंडा स्वामी, आंध्र प्रदेश के किसान नेता पी शंकर रेड्डी, पंजाब के भूपेंद्र सिंह मान, हरियाणा के प्रेम सिंह दहिया भी पहुंचे। महाराष्ट्र के किसान नेता शेतकारी संगठन के शरद जोशी का भी उन्हें साथ मिला, हालांकि बाद में शरद जोशी विचार और नीतियों में मतभेद के कारण अलग हो गए, लेकिन तब तक चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पहचान देश-दुनिया में बन चुकी थी।
किसानों की ताकत का ही नतीजा था कि बजट में गांव और किसान को फोकस किया जाने लगा। गन्ना मूल्य की एसएपी में एक रुपये की वृद्धि होती थी, वह 1996-1997 में बढ़कर चार रुपये तक पहुंच गई। उत्तर प्रदेश में पांच रुपये तक की वृद्धि की गई।
स्थानीय मुद्दों के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी भाकियू ने आवाज बुलंद की। भूमंडलीकरण के दौर में डंकल प्रस्ताव, गैट समझौते के विरोध में देशभर के किसान नेताओं को एकजुट किया। मई, 1999 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत और कर्नाटक के किसान नेता नजुंडा स्वामी के नेतृत्व में किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल जर्मनी गया और गैट, डंकल प्रस्ताव और आर्थिक सुधारों के खिलाफ रणनीति बनाई। रोम में खाद एवं कृषि संगठन का विरोध हो रहा था।
यूरोपीय संसदीय समिति के सदस्यों से मुलाकात में टिकैत ने वाजिब दाम का मुद्दा भी उठाया। पेरिस में एफिल टावर पर प्रदर्शन किया। दो जून, 1999 को उन्होंने इटली के मिलान में और तीन जून को फसल और सट्टा उपज के कारोबार के विरोध में स्टाक एक्सचेंज पर प्रदर्शन किया। तब टिकैत ने कहा था कि समद्धि की प्रतीक यह बिल्डिंग किसानों से शोषण से बनी है।
रोम में फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन के मुख्यालय पर प्रदर्शन हो या फिर इटली के मैस्तरे शहर के स्टेडियम में हुई सभा, जर्मनी के स्टुटगार्ड शहर में जेनेटिक बीज बनाने वाली कंपनी के मुख्यालय पर प्रदर्शन किया।
टिकैत के निधन के बाद किसान संगठन बिखर गए। आज देशभर की बात तो छोड़िए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही किसानों के एक दर्जन से अधिक संगठन हैं। कृषि कानूनों के विरोध के मुद्दे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों में वैसा विरोध देखने को नहीं मिल रहा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान इस आंदोलन से अभी दूरी बनाए हुए हैं। भाकियू की एक बड़ी ताकत खाप भी होती थीं। आज वे भी एकजुट नहीं हैं। सभी खापें अलग-अलग तरीके से विरोध कर रही हैं। मतभेदों की बात सामने आने पर किसान संगठनों ने संयुक्त वक्तव्य जारी कर एकजुट होने का संदेश दिया है, लेकिन टिकैत जैसी हुंकार नहीं है।
किसानों की फसल का वाजिब दाम और उस पर खरीद एक बड़ी समस्या है। हाल ही में धान की फसल मंडी में आई तो पश्चिमी यूपी के किसानों को बासमती धान मोटे धान की कीमत पर बेचना पड़ा। खुले बाजार में तो सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिला। किसानों की एक बड़ी मांग उसकी फसल की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर खरीद की गारंटी की है।
एमएसपी पर खरीद के आंकड़ों की बात करें तो इस बार धान के कुल उत्पादन की 43 फीसदी खरीद हुई। 57 प्रतिशत धान खुले बाजार के हवाले रहा। गेहूं की 36 फीसदी खरीद ही एमएसपी पर हुई है। गन्ना ही एक ऐसी फसल है, जिसकी 80 प्रतिशत खरीद सरकार द्वारा निर्धारित परामर्शी मूल्य पर हुई है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में पिछले दो साल में गन्ना मूल्य में वृद्धि नहीं हुई है।