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UP Election: 'यहां सियासत के लिए कोई जगह नहीं' दारुल उलूम को हर चुनाव से पहले इसलिए जारी करना पड़ता है ये बयान

Fri, 05 Apr 2024 07:16 AM IST
आकाश दुबे विनीत तोमर, अमर उजाला, सहारनपुर

सार

दारुल उलूम में देश के कोने-कोने से करीब साढ़े चार हजार छात्र इस्लामी तालीम हासिल करते हैं। हर मुसलमान दारुल उलूम के साथ भावनात्मक तौर से भी जुड़ा है। दारुल उलूम कोई फतवा जारी करता है तो उसे हर मुस्लिम मानता है।
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दारुल उलूम, देवबंद
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विस्तार
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देवबंद स्थित इस्लामिक इदारा दारुल उलूम यूं तो मजहबी तालीम और विश्व में देवबंदी विचारधारा के लिए जाना जाता है, लेकिन सियासत और सियासी लोगों का भी यहां से पुराना नाता रहा है। ऐसा एक या दो बार नहीं, बल्कि कई बार हुआ जब राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े दिग्गजों ने दारुल उलूम पहुंचकर अपनी सियासी जमीन तलाशने की कोशिश की। पर, एक घटनाक्रम ने ऐसा माहौल बना दिया कि दारुल उलूम को हर बार चुनाव से पहले बयान जारी करना पड़ता है कि यहां पर राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है।

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दरअसल, हुआ कुछ ऐसा था कि साल 2009 में एक पार्टी के बड़े नेता यहां पर पहुंचे थे। उस समय उन्होंने तत्कालीन कुलपति मौलाना मरगूबुर्रहमान का हाथ पकड़कर अपने सिर पर रख लिया था। इसकी फोटो भी खिंचवा ली थी। इसके बाद उस फोटो का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में इस तरीके से किया गया जैसे दारुल उलूम ने उन्हें अपना समर्थन दे दिया हो। यह मामला काफी सुर्खियों में रहा था।

इसलिए पहुंचते हैं सियासी दिग्गज
दारुल उलूम देवबंद की स्थापना 30 मई 1866 को हुई थी। इसकी स्थापना हाजी सैयद मोहम्मद आबिद हुसैन, फजलुर्रहमान उस्मानी और मौलाना क़ासिम नानौतवी ने की थी। इसके पहले उस्ताद (शिक्षक) महमूद देवबंदी और पहले छात्र महमूद हसन देवबंदी थे। इसमें देश के कोने-कोने से करीब साढ़े चार हजार छात्र इस्लामी तालीम हासिल करते हैं। हर मुसलमान दारुल उलूम के साथ भावनात्मक तौर से भी जुड़ा है। दारुल उलूम कोई फतवा जारी करता है तो उसे हर मुस्लिम मानता है। नेता भी इसी सोच के साथ दारुल उलूम के दरवाजे पहुंचते हैं कि उन्हें एक समुदाय का समर्थन मिल सके।

जानें कब-कब पहुंचे राजनेता
- 2009 में मुलायम सिंह यादव यहां पर आए थे। 
- 2006 में राहुल गांधी भी दारुल उलूम में पहुंचे थे। 
- 2011 में अखिलेश यादव भी यहां आए।

नोट : इसके अलावा मौलाना अबुल कलाम आजाद, फारुख अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी यहां का दौरा कर चुके हैं।

मौलाना असद मदनी रह चुके हैं तीन बार राज्यसभा सांसद
दारुल उलूम भले ही राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति नहीं देता, लेकिन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी के पिता मौलाना असद मदनी भी कांग्रेस पार्टी से तीन बार राज्यसभा सांसद रह चुके थे। मौलाना महमूद मदनी भी सपा पार्टी से 2006 से 2012 तक राज्यसभा सांसद रह चुके हैं।
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संस्था दीनी इदारा है। इसका रजनीति से कोई ताल्लुक नहीं है। इसलिए संस्था के जिम्मेदारों ने चुनाव के समय दारुल उलूम में नेताओं की एंट्री बैन की हुई है। अगर नेता यहां आता भी है तो संस्था को कोई जिम्मेदार उनसे नहीं मिलेगा। - अशरफ उस्मानी, उप प्रभारी तंजीम-ओ-तरक्की विभाग दारुल उलूम 
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