किसान नेता के रूप में विख्यात अजित सिंह के निधन से देश की किसान राजनीति में यकायक ठहराव से आ गया है। यह भी निश्चित है कि शीघ्र ही इस रिक्त स्थिति स्थान की भरपाई संभव नहीं है। इस समय भले ही सांसद या मंत्री नहीं थे, लेकिन यदि कोरोना काल न तो होता तो देश की राजधानी किसानों और उनके समर्थकों से पटी होती। यह उनके व्यक्तित्व और किसानों एवं समर्थकों में उनके प्रति श्रद्धा का सबूत होता।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पांच दशकों तक किसान राजनीति के पुरोधा रहे किसानों के मसीहा उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह भी थे। रहबरे आजम चौधरी सर छोटूराम के बाद चौधरी चरण सिंह ही अकेले ऐसे नेता रहे जिन्हें कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से देश के पूर्वी सीमांत तक के किसानों ने अपना भाग्यविधाता माना। दिल्ली में उनके 77वें जन्मदिवस पर हुई रैली इसकी बड़ी मिसाल रही।
चौधरी अजित सिंह के लिए ऐसे महान पिता का पुत्र होना ही कम गौरव की बात नहीं थी। उस पर विरासत में मिली राजनीति और किसानों के अपार समर्थन में अजित सिंह को वर्ष 1986 में देश के सर्वोच्च सदन राज्यसभा तक पहुंचा दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और पिता से मिली विरासत को बेहतर तरीके से संभाला। वर्ष 1989 में वह लोकसभा पहुंचे। केंद्र की वीपी सिंह सरकार में उद्योग मंत्री बने। 10वीं लोकसभा में चुनने के बाद केंद्रीय खाद्य मंत्री बने,11वीं और 13वीं लोकसभा में पहुंचकर कृषि मंत्री और वर्ष 2009 में नागरिक उड्डयन मंत्री का दायित्व संभाला। केंद्र की सत्ता में सियासी वजूद साबित कर इस कालखंड से गुजरते हुए अंत में चौधरी अजित सिंह रालोद के आजीवन अध्यक्ष रहे।
किसानों के प्रति उनका प्रेम अंतिम समय तक कायम रहा। उनका मानना था कि किसानों और ग्रामीण भाइयों की समस्याओं को लेकर मतभेद हो सकता है, लेकिन कृषि एवं ग्रामीण विकास ही समाज और देश के विकास का आधार है। अपने मंत्रित्व काल में उन्होंने किसानों को सूखा राहत, मिलों से दूरी कम करने, डेयरी एवं दुग्ध उत्पाद, पशुधन शोध और पशु स्वास्थ्य संस्थान जैसे कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाकर किसानों के प्रति प्रेम को जाहिर किया। वह पश्चिम उत्तर प्रदेश को हरित प्रदेश बनाने के पक्षधर रहे।
योजना आयोग के पूर्व सदस्य और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुधीर पंवार ने बताया गया कि लोकदल (अजित) के दौर में मुझे उनके साथ अधिकांश कार्य देखने का अवसर मिला। जब मैं लोकदल पत्रिका के संपादन का काम देखता था। असल में वह जितने बड़े नेता थे, उतने ही बड़े दिलवाले भी थे। पश्चिमी यूपी का किसान तो उन पर जान छिड़कता था। निश्चय ही ऐसे नेता विरले ही पैदा होते हैं। वह हमारे बीच नहीं रहे, मगर वह बहुत याद आएंगे। किसान राजनीति में खालीपन आ गया है।
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