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चुनाव के डर से वापस लिए कृषि कानून : केसी त्यागी

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चुनाव के डर से वापस लिए कृषि कानून : केसी त्यागी
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मेरठ। जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों में चुनाव में हार के डर से कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया गया है। अब सरकार को किसानों के हित में एमएसपी की गारंटी भी जरूर देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह अच्छा कदम उठाया है, लेकिन इसे किसी की हार या जीत के रूप में नहीं लेना चाहिए। यह किसानों की एकता और संघर्ष का परिणाम है।
शनिवार को आशियाना कॉलोनी में आयोजित बुनकर सम्मेलन में उन्होंने यह बात कही। त्यागी ने कहा कि हाल में ही हुए उपचुनाव में मिली हार से भी सरकार का रुख बदला है। अब जल्द संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होगा, जिसमें कृषि कानून वापस होने पर मुहर लगेगी। उन्होंने कहा कि 1950 रुपये का मूल्य निर्धारित होने के बावजूद केंद्रों पर 1500 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। किसानों को उनका हक मिलना चाहिए। आंदोलन में करीब 700 किसानों ने अपनी जान गंवाई, अगर वे घर होते तो जीवित रहते। परिवार और बच्चों को छोड़कर बुजुर्ग आंदोलन में मजबूती से डटे रहे। उन्हें खालिस्तानी और पाकिस्तानी कहा गया। उनके मजबूत इरादों ने ही सरकार को इस निर्णय के लिए मजबूर कर दिया।
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इस दौरान मौलाना मशहुदुर रहमान जमाली, जेडीयू जिलाध्यक्ष खुशनवाज अंसारी, मोमिन अंसार सभा प्रदेश अध्यक्ष मैराजुद्दीन अंसारी, बुनकर विकास समिति अध्यक्ष हबीब अंसारी, दानिश वहाब, अशरफ अली, सगीर अहमद, हाजी अहसान अंसारी, कय्यूम अंसारी, अरशद मक्की सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
हमने तीन दशकों तक खाया अमेरिका का गेहूं
केसी त्यागी ने कहा हिंदुस्तान ने 1940 के बाद तीन दशकों तक अमेरिका का गेहूं खाया, जबकि 70 के दशक के बाद किसानों की मेहनत से हमारा देश सबसे बड़ा निर्यात करने वाला बन गया। दुनिया भर में गेहूं, चावल और शक्कर पहुंचाकर देश की शान बढ़ाने वाले किसानों को कुचला जा रहा है। लखीमपुर में मंत्री का बेटा किसानों पर जीप चढ़ा देता है। इसके बावजूद मंत्री पद पर बने रहना शर्म की बात है।
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किसानों की तरह एकजुट हों बुनकर
त्यागी ने आर्थिक समस्या जूझ रहे बुनकरों को किसानों की तरह एकजुट होने पर जोर दिया। बुनकर आज सड़क पर ठेले लगाने को मजबूर हैं। लेकिन किसानों की तरह आपको भी मजबूत होकर अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाना होगा। किसानों और बुनकरों की दुर्गति में कोई फर्क नहीं है। किसानों को फसल का उचित दाम नहीं मिलता, जबकि बुनकरों को उनके बुने कपड़ों का उचित मूल्य नहीं मिलता। उन्होंने बुनकरों से ज्ञापन लेकर समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने का वादा किया।
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