मऊ। जिले की बर्न यूनिट में सात साल बाद भी स्थायी सर्जन की तैनाती नहीं हो सकी है। दो वार्ड में संचालित बर्न यूनिट साल 2018 से नर्सों के भरोसे है। जलने और झुलसने के केस आने पर सामान्य सर्जन ऑन कॉल ड्यूटी करते हैं। औसतन हर माह दस से पंद्रह केस आते हैं। इनमें से 70 फीसदी मामले रेफर कर दिए जाते हैं। स्थायी प्लास्टिक सर्जन की तैनाती के लिए सीएमएस की ओर से कई बार पत्राचार किया जा चुका है, लेकिन अभी तक तैनाती नहीं हो सकी है।
जिला अस्पताल में करीब एक दशक से बर्न यूनिट का संचालन हो रहा है। 2018 से पूर्व करीब पचास लाख की लागत से इसके लिए ट्राॅमा सेंटर के बगल में दो मंजिला भवन बनाया गया। उस समय एक प्लास्टिक सर्जन की तैनाती हुई थी। लेकिन कुछ माह बाद ही प्लास्टिक सर्जन ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद अभी तक प्लास्टिक सर्जन की तैनाती नहीं हो सकी है।
ऐसे में वर्तमान में जिला अस्पताल के दूसरे तल पर दो वार्ड में बारह बेड की बर्न यूनिट बनाकर इमरजेंसी वार्ड में तैनात यूनिट नर्सों के भरोसे संचालित हो रही है। आग से जलने व झुलसने के मरीज आने पर सामान्य सर्जन को ऑन कॉल ड्यूटी पर बुलाकर इलाज करवाया जाता है। मरीज के 30 प्रतिशत से अधिक जले होने पर बीएचयू रेफर कर दिया जाता है। यही वजह है कि इस महीने में जिला अस्पताल में अब तक 12 से अधिक मरीजों को रेफर किया गया है। वर्तमान में दोनों वार्ड में केवल तीन मरीज भर्ती मिले।
बर्न यूनिट में विशेषज्ञ डाक्टर और स्टॉफ की कमी है, इसके लिए शासन को पत्र लिखा जा चुका है। वर्तमान तैनात जनरल सर्जन को इस यूनिट का प्रभार दिया गया है।
- डॉ. धनज्जय कुमार, सीएमएस।
पुरुष वार्ड में एसी की सुविधा नहीं
मऊ। मौके पर पहुुंची टीम ने बृहस्पतिवार को पाया कि महिला और पुरुष मरीजों के लिए अलग अलग वार्ड तो बनाए गए हैं। लेकिन पुरुष वार्ड में एसी नहीं लगाया गया है। यहां एक मरीज भर्ती मिला। जबकि महिला वार्ड में एक महिला और पुरुष भी भर्ती मिला। मरीज ने बताया कि वह एसी के लिए पुरुष वार्ड से महिला वार्ड में शिफ्ट हो गया है।
हरे कपड़े की सुविधा भी नहीं
वार्ड में गंदगी के कारण संक्रमण का खतरा बना हुआ है। इतना ही नहीं, यहां डोम (स्टैंड में लगे हरे कपड़े) तक की सुविधा केवल कागजों पर है। जबकि इससे जले हुए मरीजों के शरीर को ढकने में आसानी होती है।
सर्दी और गर्मी में आते हैं ज्यादा केस
मऊ। जिला अस्पताल की बर्न यूनिट में सामान्य दिनों में औसतन हर माह दस से पंद्रह केस आते हैं। इसमें 30 फीसदी तक झुलसे मरीजों का ही उपचार हो पाता है। जबकि इससे ज्यादा जले होने पर उन्हें रेफर कर दिया जा रहा है। औसतन 70 फीसदी मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। बर्न यूनिट का प्रभार देख रहे सर्जन डॉ. आरके गुप्ता ने बताया कि मरीजों की संख्या सर्दी में और गर्मी में सबसे ज्यादा होती है। अलाव तापने और गर्मी में आग लगी की घटनाओं से इसका इजाफा होता है।
बर्न वार्ड में होने चाहिए ये संसाधन
मऊ। सीएमएस डॉ. धनंजय कुमार ने बताया कि बर्न मरीजों के लिए विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। प्लासिटक सर्जन के साथ अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों व स्टाफ की अलग से नियुक्ति होती है। उच्चस्तरीय उपकरण, जीवन रक्षक मशीनें लगाई जाती हैं। झुलसे लोगों को बर्न वार्ड में गहन चिकित्सकीय देखरेख में रखा जाता है। वार्ड कीटाणु मुक्त होना चाहिए। इसमें चिकित्सकीय स्टाफ को छोड़कर अन्य लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध रहता है।
बेल्थरारोड के मठिया निवासी प्रमोद ने बताया कि तीन माह पहले करंट लगने पर वह जिला अस्पताल पहुंचा था, लेकिन डाॅक्टरों ने उसे रेफर कर दिया था। इसके बाद उसने निजी अस्पताल में इलाज कराया।
गाजीपुर के मरदह के सुनील ने बताया कि पिछले दिनों वह अपने एक झुलसे रिश्तेदार को लेकर जिला अस्पताल पहुंचा था। वहां उसने उसे पुरुष वार्ड में भर्ती कराया, लेकिन वार्ड में एसी की सुविधा नहीं थी। वहां संक्रमण से बचाव के लिए भी इंतजाम नहीं थे।
दो बार भेजा जा चुका है प्रस्ताव
सीएमएस डॉ. धनंजय कुमार ने बताया कि उनके पूर्व में भी सीएमएस रहे जिम्मेदारों ने बर्न यूनिट के विशेषज्ञ डाॅक्टर और स्टॉफ के लिए पत्र लिखा है। मैंने अब तक दो बार पत्र भेजकर शासन को इस समस्या के बारे में अवगत कराया है।