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Mau News: 3 साल कटान से बचाव के लिए 50 करोड़ खर्च, फिर भी सरयू में समा गए 300 घर

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जिले में सरयू नदी में बारिश के बाद जलस्तर बढ़ने और उसके बाद घटाव से कटान की समस्या से तीन साल में 300 से ज्यादा घर सरयू नदी में समा गए हैं। वहीं इस दौरान तीन पुरवा का तो अस्तित्व नदी में समाकर खत्म हो चुका है। अब तक लगभग तीन हजार एकड़ से अधिक कृषि उपयोगी जमीन नदी में विलीन हो चुकी है। कटान को रोकने के लिए तीन साल में सिंचाई विभाग की तरफ से 50 करोड़ से ज्यादा की राशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन अभी तक कटान की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है।
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जिले में सरयू नदी के कटान से बचाव के लिए सिंचाई विभाग की तरफ से प्रतिवर्ष कार्ययोजना बनाई जाती है, लेकिन बरसात शुरू होने के बाद नदी के उग्र रूप धारण करने के बाद कटान रोकने के नाम पर खानापूर्ति ही नजर आती है। मुक्तिधाम की सुरक्षा के लिए कटाव निरोधक परियोजना पूर्ण हो चुकी है। इसमें 7.1 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसके अलावा सूरजपुर के पुनस्थापना कार्य से संबंधित 6.32 करोड़ की परियोजना भी लगभग पूर्ण होने की ओर है। इस वर्ष भी कटान को रोकने के लिए 13.50 करोड़ खर्च किया रहा है। नदी की धारा धीरे-धीरे वाराणसी-गोरखपुर राजमार्ग की तरफ बढ़ रही है। मात्र 100 मीटर दूरी पर सरयू बह रही है। इसी तरह हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 1988 से ही सरयू नदी का रुख दोहरीघाट कस्बे की ओर बना हुआ है। लहरों ने गौरीशंकर घाट की प्राचीन धरोहर को पहले ही काटकर नदी में समाहित कर लिया है। 1992 में तत्कालीन जिलाधिकारी ने गौरीशंकर घाट पर 24 घंटा खड़े होकर पौराणिक धरोहरों के बचाने का प्रयास किया था, लेकिन वह सफल नहीं हो पाए थे। मधुबन के बिंटोलिया में दर्जनों मकान हो चुके हैं। अन्य मकान का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जबकि बिंदटोलिया गांव को बचाने के लिए 12.34 करोड़ की लागत से प्रोजेक्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा ड्रेजिंग डायवर्जन चैनलाइजेशन परियोजना के तहत छह किलोमीटर लंबा चौड़ा तीन मीटर गहरा करने काम पूरा कर लिया गया, लेकिन कटान नहीं रुक रहा है।



सिंचाई विभाग की तरफ से कटान रोकने के लिए उपाय कागज पर ही चल रहा है। कटान पीड़ितों के अनुसार, बिंदटोलिया गांव में तीन वर्ष पहले 500 घर हुआ करते थे। लगभग पांच हजार एकड़ कृषि उपयोगी जमीन थी। लेकिन कटान होने के चलते अब मात्र 200 घर बचे हैं, लेकिन अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। एक हजार एकड़ कृषि उपयोगी जमीन बची है। प्रतिदिन उपजाऊ जमीन नदी में विलीन हो रही है। मधुबन के केवटहिया, पंचपड़वा, बलुआ सहित पुरवे पूरी तरह नदी में समाकर अपना वजूद खो चुके हैं। जअगर यहां स्थायी ठोकर का निर्माण कर दिया जाए तो लोगों की समस्या से निजात मिल सकती है। वर्ष 1991 से लेकर अब तक सरयू की धारा में किसानों की तीन हजार एकड़ से अधिक कृषि उपयोगी जमीन विलीन हो चुकी है।
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