स्वामीजी के निधन के बाद परम भक्त जगन्नाथ महाराज ने रंगमहल नामक दूसरा मंदिर बनवाया। इस मंदिर में बांकेबिहारी लगभग वर्ष 1719 तक भक्तों को दर्शन दिए। उसी साल करोली की रानी के स्नेह बंधन पर उनके राज्य में चले गए ठाकुरजी वर्ष 1721 तक वहां अपने लिए बनाए गए तीसरे मंदिर में विराजित हुए।
वर्ष 1769 तक ठा.बांकेबिहारी भरतपुर में बने चौथे मंदिर में विरामान हुए। वहां से गोस्वामी रूपानंद 11 अप्रैल 1769 में चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को बिहारीजी को वापिस राजस्थान से वृंदावन लाए। सेवायत ने बताया कि इसके बाद ठाकुरजी लगभग वर्ष 1787 तक निधिवनराज में बनाए गए पांचवें मंदिर में विराजे। उसी वर्ष सेवायतों ने ठाकुर बांकेबिहारी को पुराने शहर में बने छठे मंदिर में विराजमान किया।
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उसी मंदिर के परिसर का वर्ष 1864 में विस्तार हुआ और राजस्थानी हवेली शैली के वर्तमान सातवें मंदिर में ठाकुर बांकेबिहारी भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। बांकेबिहारी मंदिर के सेवायत प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी ने कहा कि शासन से मांग की है कि अब यदि आठवीं बार आराध्य के लिये नया मंदिर बनाया जाए तो वह कॉरिडोर की अपेक्षा उचित होगा। इससे वृंदावन का स्वरूप भी बना रहेगा और ठाकुरजी अयोध्या की तर्ज पर नवीन मंदिर में विराजमान हो जाएंगे।