जितने अनोखे ठाकुर बांकेबिहारी हैं, उतना ही अनोखा है उनका स्वर्ण-रजत जड़ित हिंडोला। तभी तो शुक्रवार को हरियाली तीज पर्व पर श्रद्धालुओं में अपने लाड़ले आराध्य को श्रद्धा और भक्ति की डोर से हिंडोले में झुलाने की होड़ लग गई। जन-जन के आराध्य ठाकुर बांकेबिहारी जैसे ही दुनिया भर के इकलौते स्वर्ण-रजत हिंडोले में विराजमान हुए तो मंदिर प्रांगण में ठाकुरजी की जयजयकार हो उठी। श्रद्धालु उन्हें अपलक निहारते रहे।
ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में शुक्रवार को आस्था का समुद्र उमड़ पड़ा। शाम चार बजे जैसे ही मंदिर के पट खुले तो दर्शन के लिए श्रद्धालु मंदिर में पहुंचने लगे। यह क्रम मध्यरात्रि 12 बजे तक जारी रहा। ठाकुरजी के पहले दर्शन की चाहत में दोपहर से ही श्रद्धालुओं ने मंदिर के बाहर ही डेरा डाल दिया था। पट खुलने तक मंदिर प्रांगण में महिलाएं मंगलगीत और बधाई गायन करती रहीं।
मंदिर के मुख्यद्वार, चबूतरे और मंदिर प्रांगण में सुगंधित पुष्पों की महक श्रद्धालुओं को और भी आनंदित कर रही थी। चार बजे तक मंदिर के बाहर काफी श्रद्धालु इकट्ठा हो गए थे। पट खुलते ही श्रद्धालुओं ने हाथ उठाकर आराध्य के जयकारे लगाए। उमस भरी गर्मी में भी महिलाएं, बच्चे, वृद्ध और युवा दर्शन के लिए लालायित दिखे।
मंदिर में सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी सादा वर्दी में भी तैनात रहे। श्रद्धालुओं को मेटल डिटेक्टर से गुजारा गया। विद्युत अधिकारी भी मेले की व्यवस्थाओं के लिए मुस्तैद दिखे।
लाड़ले ने थककर सुखसेज पर किया विश्राम
साल में एक बार स्वर्ण हिंडोले में विराजकर भक्तों को दर्शन देने के बाद ठाकुर बांकेबिहारी महाराज सुखसेज पर विश्राम करते हैं। मान्यता है कि काफी देर झूला झूलने से ठाकुरजी थक जाते हैं। इसलिए परंपरा के अनुसार उन्हें सुखसेज पर विश्राम कराया जाता है।
मंदिर सेवायत मनीष गोस्वामी ने बताया कि सुखसेज पर ठाकुरजी सेवा में रजत कलश में जल, पान का बीड़ा, रजत कंघी, आदमकद रजत आईना और लड्डू आदि निवेदित किए जाते हैं। सुखसेज के बराबर में ही सुहाग की पिटारी और सोने की नथ भी रखी गई। यह दर्शन आम लोगों के लिए सुलभ नहीं हैं केवल सेवायत ही इसके अधिकारी होते हैं।
इन मंदिरों में भी सजे हिंडोले
हरियाली तीज के अवसर पर वृंदावन के प्रमुख राधावल्लभ मंदिर, राधारमण मंदिर, राधासनेह बिहारी मंदिर, राधाश्याम सुंदर मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, रंगजी मंदिर, यशोदानंदन धाम सहित अन्य मंदिरों में भी श्रद्धालुओं ने झूले में विराजमान ठाकुरजी के श्रीविग्रह के दर्शन किए।
श्रीकृष्ण ने किए थे राधा जू के सोलह शृंगार
कथा प्रचलित है कि द्वापर में कंस के डर से नंदबाबा श्रीकृष्ण को लेकर नंदगांव आ गए थे। इधर राधाजी भी अपनी ननिहाल गांव रावल छोड़कर बरसाना में आ र्गइं। इसके बाद राधा और कृष्ण के बढ़ते अलौकिक अनुराग और रोज-रोज मिलन की बात सुनकर नंदबाबा और वृषभानुजी ने दोनों के आपसी प्रेम पर चर्चा की। बताया जाता है कि हरियाली तीज के दिन नंदबाबा ने वृषभानु जी के यहां सोलह शृंगार का सामान भेजा था। यह बात जब श्रीकृष्ण को पता चला तो खुद ही शृंगार का सामान लेकर प्रेम सरोवर पहुंच गए।
हां पूर्व निर्धारित समय के अनुसार राधाजी भी सखियों के साथ पहुंच र्गइं। गर्ग संहिता के अनुसार प्रेम सरोवर के किनारे ही भगवान कृष्ण ने अपने हाथों से राधाजी का शृंगार किया और उनके हाथों पर मेहंदी रचाई। राधाजी को श्रीकृष्ण ने सखियों के साथ झूला भी झुलाया। तभी से सुहागिनों में हरियाली तीज पर मेहंदी रचाने और शृंगार की परंपरा शुरू हुई है। भगवान शिव और पार्वती के संबंध में इसी तरह की कथा शिव पुराण में भी है।