मथुरा। कंकाली टीला अब सिर्फ समतल जमीन बनकर रह गया है। कभी यहां विशाल टीला हुआ करता था, लेकिन अतिक्रमण और रखरखाव के अभाव में अब टीले के केवल कंकाल ही शेष हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के इस टीले और कुंड सहेजने के प्रयास नाकाफी हैं। ऐतिहासिक धरोहर होने के बावजूद लोगों को इसके बारे में कुछ पता तक नहीं है।
शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा कंकाली टीला आज अपनी पहचान के लिए जूझता नजर आ रहा है। कभी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध यह स्थल अब महज एक साधारण हरियाली वाला समतल स्थान बनकर रह गया है। एएसआई ने टीले और यहां स्थित कुंड के संरक्षण के लिए कई प्रयास किए हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में यह धरोहर उपेक्षित बनी हुई है। विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर जब इस स्थल की स्थिति पर नजर डाली गई तो पाया गया कि यहां पर्यटकों की आवाजाही न के बराबर है। स्थानीय लोगों को भी इसके ऐतिहासिक महत्व की पर्याप्त जानकारी नहीं है।
इतिहासकारों के अनुसार कंकाली टीला प्राचीन काल में बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ा एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जहां से कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। एएसआई द्वारा परिसर में सफाई, संरक्षण और सीमांकन जैसे कार्य किए गए हैं। यहां सूचना पट्टिकाओं की कोई व्यवस्था नहीं है और न ही पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कोई विशेष पहल की गई है। कंकाली टीला अपनी समृद्ध विरासत के बावजूद पहचान के अभाव में गुमनामी की ओर बढ़ रहा है। आवश्यकता है कि इसे केवल पार्क न समझकर एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित और प्रचारित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसके महत्व को समझ सकें।