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‘पवित्र हृदय की प्रार्थना ही सुनते हैं ईश्वर’

Fri, 26 Jun 2015 12:31 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला कोसीकलां
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जो व्यक्ति सत्कर्म और सद्व्यवहार को ग्रहण करके भगवान की उपासना करते हैं, वही धार्मिक कहलाते है। राष्ट्रीय संत विहर्ष सागर महाराज ने गुरुवार को हाईवे पर एक सागर कालोनी में आयोजित धर्म सभा में ये सीख दी। उन्होंने कहा कि धारण करने को ही धर्म कहते हैं।
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जैन मुनि ने कहा कि हमारे सामने जैसा आदर्श होता है, हम वैसे ही बनते हैं। अत: जीवन में ऊंचाई पाने के लिए हमें अच्छे आदर्शों को अपने समक्ष रखना होगा। प्रतिदिन भगवान की वाणी सुन कर उस पर चलने की कोशिश करनी होगी।

उन्होंने कहा कि दान देने से पहले इससे आश्वस्त हों कि दिया धन व्यर्थ तो नहीं जाएगा। यदि किसी अधर्मी व्यक्ति की मदद करनी पड़े तो सबसे पहले उससे धर्म पर चलने का आश्वासन लो। लोग भगवान तो बनना चाहते है, लेकिन राग-द्वेष मन में रहता है। पवित्र हृदय से की जाने वाली प्रार्थना को ही ईश्वर सुनते हैं।
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जैन मुनि विहसंत सागर महाराज, जैन मुनि विजयेश सागर ने कहा कि इस प्राणी जगत में धर्म की आराधना ही जीवन की आराधना है। धर्म ही उत्तम सुख का खजाना है, धर्म ही मंगल गीत है, धर्म ही मंगल स्वर है, धर्म से जीवन की सारगर्भिता है, धर्म ही मंगल इतिहास है। धर्म गैर को भी अपना बना देता है। जीवन में धर्म का महत्व जीवन के महत्व से कहीं ज्यादा है। धर्म जीवन का उजाला है। भारत देश को धर्म का मार्गदर्शी कहा जाता है क्योंकि यहां पर धर्म से सुंदर कृतियां बनी हैं। धर्म से ही जीवन संवरा है। धर्म से ही धर्मात्मा, पुण्यात्मा और उत्कृष्ट आत्मा हैं। कार्यक्रम में समाज के अध्यक्ष ओमप्रकाश जैन, सुभाष जैन, कैलाश चंदोरिया, देवेन्द्र जैन, अनुराग जैन, आलोक जैन, अखिल जैन, प्रेमचंद जैन, दीपक जैन, दिनेश आढती, नरेन्द्र जैन,  सतीश चन्द जैन आदि शामिल हुए।
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