शक्तिपीठ मां बड़ी चंद्रिका देवी प्रतिमा
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महोबा। देश के 51 शक्तिपीठों में शुमार मां बड़ी चंद्रिका चंदेल कालीन राजाओं व वीर आल्हा-ऊदल की आराध्य देवी रहीं हैं। किसी भी युद्घ में जाने से पहले आल्हा-ऊदल मां के दरबार में माथा टेकने जाते थे। मान्यता है कि सच्चे मन से आराधना करने वाले भक्तों की मां चंद्रिका सभी मनोकामनाएं पूरी करतीं हैं। 12 फीट ऊंची ग्रेनाइट शिला पर उत्कीर्ण 18 भुजा की प्रतिमा के दर्शन के लिए नवरात्र पर्व पर उत्तरप्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश के विभिन्न जनपदों से भक्त पहुंचते हैं।
शहर के छतरपुर मार्ग स्थित मां बड़ी चंद्रिका देवी की मूर्ति कितनी पुरानी है इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है। चंदेल राजा चंदवर्मन ने अपने पिता के निर्देश पर ताराचंडी देवी को अपना ईष्ट माना और 831 ईस्वी में विशाल यज्ञ कराया था। दुर्गा सप्तशती के अनुुसार हिमालय क्षेत्र के महिषासुर दैत्य के सेनापति चंड से जब देवी ताराशक्ति से संग्राम हुआ तो वह अपनी जान बचाने के लिए इसी स्थान पर आकर छिपा था। महाबलशाली दैत्य चंड को मारने के लिए ताराशक्ति को 17 अस्त्रों का प्रयोग करना पड़ा। इसलिए उनकी सभी भुजाओं में अस्त्र है। दैत्य चंड का वध करने के कारण ताराशक्ति का नाम यहां चंद्रिका देवी पड़ गया। आसपास के जनपदों से यहां भक्त दर्शन के लिए आते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. भरत त्रिपाठी बताते हैं कि मां बड़ी चंद्रिका के दरबार में माथा टेकने से भक्तों के सभी दुखदर्द दूर होते हैं। मां अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।