घुघली। प्रभु श्रीराम अयोध्या से वन चले गए, लेकिन भरत का आना सुन घबरा गए। कहीं भरत मेरे बिना प्राण न त्याग दे। देवता भी भयभीत हो गए थे कि कहीं भरत व रामचंद्र का प्रेम प्रभु को अयोध्या जाने के लिए विवश न कर दे।
ये बातें ग्राम सभा हरखा प्यास में आयोजित श्रीराम कथा के छठे दिन कथा वाचक राजन महराज ने कही। उन्होंने कहा कि भरत को न तो रात को नींद आती है और न ही दिन में भूख लगती है। यह पवित्र सोच में ऐसे विफल हैं जैसे कीचड़ में डूबी हुई मछली को जल की कमी से व्याकुलता होती है। भरत सोचते हैं की माता के काल ने जो कुचाल की है वह कहने योग्य नहीं है। भरत मन ही मन सोच रहे थे कि राम का राज्याभिषेक किस प्रकार से हो, मुझे तो एक भी उपाय सोच नहीं पड़ता। क्या गुरु जी की आज्ञा मानकर प्रभु घर चले आएंगे? क्या माता कौशल्या के कहने पर भी प्रभु अयोध्या वापस लौटेंगे। भरत कह रहे हैं कि समय खराब है। विधाता धाता भी प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूं तो सेवक का धर्म शिव जी के पर्वत कैलाश से भी भारी है।